आहोई अष्टमी 2025: व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व

 आहोई अष्टमी 2025: संपूर्ण व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व

आहोई अष्टमी 2025 व्रत कथा और पूजा विधि


परिचय:

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली आहोई अष्टमी माताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह व्रत मुख्यतः संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन स्त्रियां निर्जल या फलाहार व्रत रखकर संध्या समय आहोई माता की पूजा करती हैं और संतान की रक्षा की कामना करती हैं।


 तारीख और मुहूर्त:

आहोई अष्टमी की तिथि: सोमवार, 13 अक्टूबर 2025 

अष्टमी तिथि प्रारंभ: 13 अक्टूबर दोपहर लगभग 12:24 बजे 

अष्टमी तिथि समाप्त: 14 अक्टूबर की सुबह लगभग 11:09 बजे 

पूजा मुहूर्त: शाम के समय, लगभग 5:59 बजे से 7:14 बजे तक (स्थानीय समय अनुसार) 


आहोई अष्टमी व्रत की परंपरा

आहोई अष्टमी का व्रत विशेषकर उत्तर भारत—उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब आदि क्षेत्रों में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन माताएं प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं और दिनभर निर्जल या फलाहारी उपवास रखती हैं। संध्या के समय जब आकाश में तारे निकल आते हैं, तब आहोई माता की पूजा की जाती है।



व्रत की विस्तृत विधि

1. स्नान एवं संकल्प: प्रातः सूर्योदय से पहले स्नान कर आहोई माता के व्रत का संकल्प लें।


2. व्रत नियम: दिनभर बिना अन्न और जल ग्रहण किए उपवास रखें। फलाहार करना चाहें तो केवल फल व दूध ले सकते हैं।


3. आहोई चित्रांकन: दीवार या पूजा स्थल पर आहोई माता का चित्र या पोस्टर लगाएं। परंपरानुसार सात छिद्र (सात तारों का प्रतीक) वाला चित्र बनाया जाता है।


4. संध्या पूजन: संध्या समय परिवार सहित दीपक जलाकर आहोई माता की पूजा करें। चांदी या मिट्टी की आहोई की प्रतिमा के सामने जल, फल, मिठाई और रौली-अक्षत अर्पित करें।


5. कथा श्रवण: व्रत कथा का श्रवण करें और तारे निकलने के बाद आकाश के तारों को अर्घ्य अर्पित करें।


6. अर्घ्य एवं समापन: तारों को जल अर्पित करने के बाद ही व्रत का समापन करें और प्रसाद ग्रहण करें।



आहोई अष्टमी की पौराणिक कथा

एक प्राचीन कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण महिला अपने घर के बच्चों के लिए जंगल से मिट्टी खोदने गई। अनजाने में उसने एक जंगली जीव (सियार) के बिल को क्षति पहुँचा दी, जिससे उसके बच्चे मर गए। क्रोधित सियार ने उस महिला को शाप दिया कि उसके सभी बच्चे अल्पायु होंगे। महिला ने अपने अपराध का पश्चाताप करते हुए देवी पार्वती की आराधना की। माता पार्वती ने करुणा दिखाते हुए कहा कि कार्तिक मास की कृष्ण अष्टमी को आहोई माता का व्रत रखने और सात छिद्रों वाले चित्र की पूजा करने से उसके सभी पाप नष्ट होंगे और संतान की रक्षा होगी। तब से इस व्रत की परंपरा चली आ रही है।



व्रत का महत्व

संतान की लंबी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति।


परिवार में सुख, शांति और समृद्धि।


जीवन से नकारात्मकता और कष्टों का निवारण।


मातृत्व की शक्ति और पारिवारिक एकता का प्रतीक।



विशेष उपाय

चांदी की आहोई माता की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने से विशेष फल मिलता है।

“ॐ आहोई माता नमः” मंत्र का 108 बार जाप करने से संतान को बल-बुद्धि की प्राप्ति होती है।

व्रत समाप्ति के बाद जरूरतमंद को भोजन या वस्त्र दान करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।



आधुनिक संदर्भ

आज के समय में भी आहोई अष्टमी का महत्व कम नहीं हुआ है। शहरी क्षेत्रों में महिलाएं मंदिरों और घरों दोनों जगह पूजा का आयोजन करती हैं। डिजिटल युग में लोग ऑनलाइन पूजा सामग्री मंगवाकर इस व्रत को अधिक सुगमता से निभा रहे हैं।


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