Sampoorna Sundar Kand Paath With Hindi Meaning
संपूर्ण सुन्दर कांड पाठ कैसे करें हिंदी में
With Lyrics & Music
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| Sunderkand paath |
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संपूर्ण सुंदरकांड का पाठ सुनिए लिरिक्स के साथ
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हनुमान जी के सुन्दर सुन्दर भजन सुनिए
सम्पूर्ण सुंदरकांड पाठ
सम्पूर्ण सुंदरकांड पाठ क्यों करें :
श्री हनुमान जी की भक्ति पाना चाहते हो , और यदि श्री हनुमान जी को पूर्ण रूप से प्रसन्न् करके उनकी कृपा पाना चाहते हो तो उसका एकमात्र साधन है , सुंदरकांड का पाठ करें , या नित्य ऑडियो के रूप में सुंदरकांड का पाठ अपने घर पर चलाएं ,श्री हनुमान जी आप पर जरूर प्रसन्न होंगे और आपके बिगड़े काम जरूर बनाएंगे , श्री राम चरितमानस के सुंदरकांड में हनुमान जी के बल का एवं श्री राम जी के आर्शीवाद का बखान किया है इसलिए जब भी कोई इसका पाठ करता है तो उसमें एक आत्मविश्वास बढ़ने की अनुभूति होती है।
अच्छे परिणाम , बिगड़े हुए सभी कामो एवं सम्पूर्ण विकास के लिए सुंदरकांड का पाठ मंगलवार एवं शनिवार को करना चाहिए , इसका संगीतबद्ध यानी की स्वरों में पाठ करने से घर की सारी अशुद्धियाँ दूर हो जाती है , इसलिए आप ऑडियो के रूप में भी इसे चला सकते हैं जो की ऊपर हमने वीडियो में बनायीं है , आप इसे नित्य भी चला सकते हैं ,ज्योतिष के अनुसार यदि कोई गृह आपकी कुंडली में परेशानी दे रहा हो तो अथवा साडे साती शनि की दशा हो तो सुंदरकांड का पाठ करके अथवा घर में चलाके इससे मुक्ति मिलती है।
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कैसे करें सुन्दरकांड का पाठ
मंगलवार अथवा शनिवार को सुबह जल्दी उठकर स्नान करें , स्नान के बाद स्वक्ष वस्त्र पहने ,इसके बाद एक लकड़ी की चौकी को अपने घर पर या जहाँ मंदिर हो उसके पास रखें , उसपर एक लाल कपडा विछाये , उसपर थोड़े फूल रखकर उसपर हनुमानजी की एक प्रतिमा रूप फोटो को रखें , उसके बाद हनुमान जी पर लाल टीका लगाएं इसके बाद प्रतिमा पर माला चढ़ाएं , उसके बाद एक घी का दिया जला कर अपने समस्त देवो को नमन करके ,हनुमान जी को नमन करके पाठ का सुभारम्भ करें।
यदि किसी परेशानी या कस्ट से निवारण चाहिए तो शनिवार अथवा मंगलवार के आलावा सुंदरकांड का पाठ नित्य भी कर सकते हैं.
सम्पूर्ण सुंदरकांड पाठ हिंदी अर्थ सहित
श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस पद्ञम सोपान शान््तं॑ शाश्चवतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीद्धसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्। रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्दे5ह॑ करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥ १॥ शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजीसे निरन्तर सेवित, वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, सर्वव्यापक, देवताओंमें सबसे बड़े, मायासे मनुष्यरूपमें दीखनेवाले, समस्त पापोंको हरनेवाले, करुणाकी खान, रघुकुलमें श्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥ नान्नया स्पृहा रघुपते हदयेउस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्ति प्रयच्छ रघुपुड़व निर्भरां मे कामादिदोषरहितं॑ं कुरू मानसं च॥२॥
हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये॥ २॥ अतुलितबलधामं॑ हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्त. वातजातं॑ नमामि॥ ३॥
अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत (सुमेरु)-के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [-को ध्वंस करने ]-के लिये अग्निरूप, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणोंके निधान, वानरोंके स्वामी, श्रीरघुनाथजीके प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमानजीको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३॥
जामवंत के बचन सुहाए। स॒ुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥१॥
जाम्बवानूके सुन्दर वचन सुनकर हनुमानूजीके हृदयको बहुत ही भाये। [वे बोले--] हे भाई! तुमलोग दुःख सहकर, कन्द- मूल-फल खाकर तबतक मेरी राह देखना॥ १॥
जब लगि आवोौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥। यह कहि नाइ सबन्हि कहेँ माथा। चलेउठ हरषि हिये धरि रघुनाथा॥ २॥ जबतक मैं सीताजीको देखकर [लौट] न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदयमें श्रीरघुनाथजीको धारण करके हनुमानजी हर्षित होकर चले॥ २॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़े3ठ ता ऊपर॥। बार बार रघुबीर सॉँभारी। तरकेड पवनतनय बल भारी॥ ३॥ समुद्रके तीरपर एक सुन्दर पर्वत था। हनुमानजी खेलसे ही (अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार श्रीरघुवीरका स्मरण करके अत्यन्त बलवान् हनुमानजी उसपरसे बड़े वेगसे उछले॥ ३॥
जेहिं गिरि चरन देह हनुमंता। चअलेउड सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउड हनुमाना॥ ४॥ जिस पर्वतपर हनुमानजी पैर रखकर चले (जिसपरसे वे उछले), वह तुरंत ही पातालमें धँस गया। जैसे श्रीरघुनाथजीका अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमानजी चले॥ ४॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तें मैनाक होहि. अ्रमहारी॥ ५॥ समुद्रने उन्हें श्रीरघुनाथजीका दूत समझकर मैनाक पर्वतसे कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला हो (अर्थात् अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे)॥ ५॥ [दोहा १] हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ हनुमान्जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा-- भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ ?॥ १॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानें कहूँ बल बुद्द्षि बिसेषा॥ सुरसा नाम अहिन्ह के माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ १॥ देवताओंने पवनपुत्र हनुमानूजीको जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धिको जाननेके लिये (परीक्षार्थ) उन्होंने सुरसा नामक सर्पोंकी माताको भेजा, उसने आकर हनुमानूजीसे यह बात कही--॥ १॥
आजु सुरन््ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ राम काजु करि फिरि मैं आवॉं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ २॥ आज देवताओंने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान्ूजीने कहा--श्रीरामजीका कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीताजीकी खबर प्रभुको सुना दूँ,॥२॥
तब तव बदन पैठिहडें आई। सत्य कहडें मोहि जान दे माई॥ कवनेहूँ जतन देह नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥ ३॥ तब मैं आकर तुम्हारे मुँहमें घुस जाऊँगा [तुम मुझे खा लेना]। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपायसे उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमानूजीने कहा-तो फिर मुझे खा न ले॥ ३॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥। सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥ ४॥ उसने योजनभर (चार कोसमें) मुँह फैलाया। तब हनुमानूजीने अपने शरीरको उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजनका मुख किया। हनुमानजी तुरंत ही बत्तीस योजनके हो गये॥ ४॥
जस जस सुरसा बदन बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ ५॥ जैसे-जैसे सुरसा मुखका विस्तार बढ़ाती थी, हनुमानजी उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन (चार सौ कोसका) मुख किया। तब हनुमानूजीने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। सागा बिदा ताहि सिरे नावा॥ मोहि सुरन््ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥६॥ और वे उसके मुखमें घुसकर [तुरंत] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [उसने कहा--] मैंने तुम्हारे बुद्धि-जलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओंने मुझे भेजा था॥६॥ [दोहा २] राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देह गई सो हरषि चलेठ हनुमान॥ तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल- बुद्धिके भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब हनुमानजी हर्षित होकर चले॥ २॥ निसिचरि एक सिंधु महूँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥ जीव जंतु जे गगन डजड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ १॥ समुद्रमें एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंको पकड़ लेती थी। आकाशमें जो जीव-जन्तु उड़ा करते थे, वह जलमें उनकी परछाईं देखकर, ॥ १॥ गहड छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥ सोहइ छल हनूमान कहूँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ २॥ उस परछाईंको पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे [और जलमें गिर पड़ते थे]। इस प्रकार वह सदा आकाशमें उड़नेवाले जीवोंको खाया करती थी। उसने वही छल हनुमान्जीसे * सुन्दरकाण्ड * १७ भी किया। हनुमानजीने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया॥ २॥ ताहि. मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि. पार गयउ मतिथीरा॥। तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजतः चंचरीक मशथ्चु लोभा॥ ३॥ पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमानजी उसको मारकर समुद्रके पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वनकी शोभा देखी। मधु (पुष्पसस)-के लोभसे भौरे गुझ्लार कर रहे थे॥३॥ नाना तर फल फूल सुहाए। खग मृग बूंद देखि मन भाए॥ सैल बिसाल देरित्र एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेठ भय त्यागें॥ ४॥ अनेकों प्रकारके वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं। पक्षी और पशुओंके समूहको देखकर तो वे मनमें [बहुत ही] प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी भय त्यागकर उसपर दौड़कर जा चढ़े ॥ ४॥ उम्ाा न कछु कपि के अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥ गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५॥ [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! इसमें वानर हनुमान्की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता है। पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लड्ढा देखी। बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता॥ ५॥ २८ * थ्रीरामचरितमानस * अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥ ६॥ वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोनेके परकोटे (चहारदीवारी )-का परम प्रकाश हो रहा है॥६॥ [छन््द १] कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारू पुर बहु बिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गने। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बने॥ विचित्र मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरोंक समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन गिन सकता है ? अनेक रूपोंके राक्षसोंके दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती॥ १॥ [छन््द २] बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहूँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं। कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकारसे भिड़ते और एक-दूसरेको ललकारते हैं॥२॥ * सुन्दरकाण्ड * १९ [छन््द ३] करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहूँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥ भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानीसे ) नगरकी चारों दिशाओंमें (सब ओरसे ) रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे हैं। तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको त्यागकर परमगति पावेंगे॥ ३॥ [दोहा ३] पुर रखवारे देखि बहु कपषि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरों निसि नगर करों पइसार॥ नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमानजीने मनमें विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय नगरमें प्रवेश करूँ॥ ३॥ मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि. चलेड सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥१॥ हनुमानजी मच्छकके समान (छोटा-सा) रूप धारण कर नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके लड्ढाको चले। [लड्जाके द्वारपर|] लड्ढडिनी नामकी एक राक्षसी रहती थी। वह बोली--मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) २० * श्रीरामचरितमानस * कहाँ चला जा रहा है ?॥ १॥ जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ मुठिका एक महा कपि हनी। रूधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ २॥ हे मूर्ख | तूने मेरा भेद नहीं जाना ? जहाँतक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी॥ २॥ पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥ जब रावनहि बहा बर दीन्हा | चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ ३॥ वह लड्डिनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली-- ] रावणको जब ब्रह्माजीनी वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि--॥ ३॥ बिकल होसि तैं कपि के मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥ तात मोर अति पुन्य बहूता। देखे, नयन राम कर दूता॥ ४॥ जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्रीरामचन्द्रजीके दूत (आप)-को नेत्रोंसे देख पायी ॥ ४॥ * सुन्दरकाण्ड * २१ [दोहा ४] तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ है तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़ेपर रखे हुए] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) -मात्रके सत्सड्रसे होता है॥४॥ प्रब्ेसि नगर कीजे सब काजा। हृदय राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ १॥ अयोध्यापुरीके राजा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखे हुए नगरमें प्रवेश करके सब काम कीजिये। उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर हो जाता है, अग्निमें शीतलता आ जाती है॥ १॥ गरुड़ सुमेरू रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥ अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥२॥ और हे गरुड़जी ! सुमेरु पर्वत उसके लिये रजके समान हो जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने एक बार कृपा करके देख लिया। तब हनुमानूजीने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान्का स्मरण करके नगरमें प्रवेश किया॥ २॥ मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥ २२ * श्रीरामचरितमानस * गयउठ दसानन मंदिर माहों। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ ३॥ उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महलकी खोज की। जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावणके महलमें गये। वह अत्यन्त विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥ ३॥ सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महँ न दीरि बैदेही॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥ ४॥ हनुमानूजीने उस (रावण)-को शयन किये देखा; परन्तु महलमें जानकीजी नहीं दिखायी दीं। फिर एक सुन्दर महल दिखायी दिया। वहाँ (उसमें ) भगवान्का एक अलग मन्दिर बना हुआ था॥ ४॥ [दोहा ५] रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ। नव तुलसिका बूंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥ वह महल श्रीरामजीके आयुध (धनुष-बाण)-के चिह्लोंसे अड्डित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन- नवीन तुलसीके वृक्ष-समूहोंको देखकर कपिराज श्रीहनुमान्जी हर्षित हुए॥ ५॥ लंका निसिचर निकर निवासा। इहा कहा सज्जन कर बासा॥॥ मन महूँ तरक करें कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ १॥ * सुन्दरकाण्ड * २३ लड्ढ्ा तो राक्षसोंक समूहका निवासस्थान है। यहाँ सज्जन (साधु पुरुष)-का निवास कहाँ? हनुमानजी मनमें इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे॥ १॥ राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदय हरष कपि सज्जन चीन््हा॥ एहि सन हठि करिहडें पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥२॥ उन्होंने (विभीषणने) रामनामका स्मरण (उच्चारण) किया। हनुमानजीने उन्हें सजन जाना और हृदयमें हर्षित हुए। [ हनुमान्जीने विचार किया कि] इनसे हठ करके (अपनी ओरसे ही) परिचय करूँगा, क्योंकि साधुसे कार्यकी हानि नहीं होती [ प्रत्युत लाभ ही होता है]॥ २॥ बिप्र रूप धरि. बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥ करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ ३॥ ब्राह्षणफा रूप धरकर हनुमानूजीने उन्हें वचन सुनाये (पुकारा) । सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये। प्रणाम करके कुशल पूछी [और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिये॥ ३॥ की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि. करन बड़भागी॥ ४॥ २४ * श्रीरामचरितमानस * क्या आप हरिभक्तोंमेंसे कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदयमें अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनोंसे प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने (घर बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं ?॥ ४॥ [दोहा ६] तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ तब हनुमानूजीने श्रीरामचन्द्रजीकी सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो गये और श्रीरामजीके गुणसमूहोंका स्मरण करके दोनोंके मन [प्रेम और आनन्दमें | मग्र हो गये॥ ६॥ सुनहु॒ पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महूँ जीभ बिचारी॥ तात कबहूँ मोहि जानि अनाथा। करेहहिं. कृपा भानुकुल नाथा॥ १॥। [विभीषणजीने कहा--] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतोंके बीचमें बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी मुझपर कृपा करेंगे ?2॥ १॥ तामस तनु कछ साधन नाहोीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥ अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥२॥ मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। परन्तु हे * सुन्दरकाण्ड * २७ हनुमान्। अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा है; क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते॥ २॥ जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥ सुनहु बिभीषन प्रभु के रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ ३॥ जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओरसे) दर्शन दिये हैं। [हनुमानूजीने कहा--] हे विभीषणजी ! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा ही प्रेम किया करते हैं॥३॥ कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिले अहारा॥ ४॥ भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ ? [जातिका] चञ्ल वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ। प्रातःकाल जो हमलोगों (बंदरों )-का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥ ४॥ [दोहा ७] अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजीने तो मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान्के गुणोंका स्मरण करके हनुमानूजीके दोनों नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥ ७॥ जानतहूँ. अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥ २६ * श्रीरामचरितमानस * एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ १॥ जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी )-को भुलाकर [विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दु:खी क्यों न हों ? इस प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त कौ॥१॥ पुनि सब कथा बिभीषन कहोी। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥ तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहडें जानकी माता॥ २॥ फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लड़ामें) रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमानूजीने कहा-हे भाई ! सुनो, मैं जानकी माताकों देखना चाहता हूँ॥२॥ जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउड पवनसुत बिदा कराई॥ करि सोड रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥ ३॥ विभीषणजीने [माताके दर्शनकी ] सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनायीं। तब हनुमानूजी विदा लेकर चले। फिर वही (पहलेका मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें (वनके जिस भागमें) सीताजी रहती थीं॥ ३॥ देखि मनहि महूँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥ * सुन्दरकाण्ड * २७ कूस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी॥ ४॥ सीताजीको देखकर हनुमानजीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी (लट) है। हृदयमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप (स्मरण) करती रहती हैं ॥ ४॥ [दोहा ८] निज पद नयन दिए मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं (नीचेकी ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है। जानकीजीको दीन (दुःखी) देखकर पवनपुत्र हनुमानजी बहुत ही दुःखी हुए॥ ८॥ तरूु पल्छकव महू रहा लुकाई। करइ बिचार करों का भाई॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किए बनावा॥ १॥ हनुमानजी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ) ? उसी समय बहुत-सी स्त्रियोंकोी साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया॥ १॥ बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदी आदि सब रानी॥ २॥ २८ * श्रीरामचरितमानस * उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावणने कहा-े सुमुखि ! हे सयानी ! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियोंको-- ॥ २॥ तव अनुचरीं करडें पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥ तन धरि ओट कहति बेैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ ३॥ मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम ख्रेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा) करके कहने लगीं--॥ ३॥ सुनु दसमुख खटद्योत प्रकासा। कबहूँ कि नलिनी करइ बिकासा॥ अस मन समुझु कहति जानकी। खल स॒ुधि नहिं रघुबीर बान की॥ ४॥ है दशमुख।! सुन, जुगनूके प्रकाशसे कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं--तू [अपने लिये भी] ऐसा ही मनमें समझ ले। रे दुष्ट | तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी खबर नहीं है॥ ४॥ सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अध्म निलज्जञ लाज नहिं तोही॥ ५॥ रे पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है। रे अधम ! निर्लज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती 2॥ ५॥ * सुन्दरकाण्ड * २९ [दोहा ९] आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥ अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्सेमें आकर बोला--॥ ९॥ सीता तें मम कृत अपमाना। कटिहडें तब सिर कठिन कृपाना॥ नाहिं लत सपदि मानु मम बानी। सुमुरिबर होति न त जीवन हानी॥ १५॥ सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाणसे काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा!॥ १॥ स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥ सो भुज कंठ कि तब असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥ २॥ [सीताजीने कहा--] हे दशग्रीव! प्रभुकी भुजा जो श्याम कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [ पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है॥ २॥ चअंद्रहास हरू मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥ सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरू सम दुख भारा॥ ३॥। ३० * श्रीरामचरितमानस * सीताजी कहती हैं-हे चन्द्रहास (तलवार) ! श्रीरघुनाथजीके विरहकी अग्रिसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले। हे तलवार ! तू शीतल, तीत्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंढी और तेज है), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले॥३॥ सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि. नीति बुझावा॥ कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ ४॥ सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया। तब रावणने सब राक्षसियोंकों बुलाकर कहा कि जाकर सीताको बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ॥ ४॥ मास दिवस महूँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥५॥ यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूगा॥ ५॥ [दोहा १०] भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बूंद। सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ [यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे॥ १०॥ त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥। सबन्ही बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ १॥ * सुन्दरकाण्ड * ३१ उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान)-में निपुण थी। उसने सबोंको बुलाकर अपना स्वप्र सुनाया और कहा--सीताजीकी सेवा करके अपना कल्याण कर लो॥ १॥ सपने बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥ खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥ २॥ स्वप्रमें [ मैंने देखा कि] एक बंदरने लड्ढा जला दी । राक्षसोंकी सारी सेना मार डाली गयी। रावण नंगा है और गदहेपर सवार है। उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं॥ २॥ एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहूँ. बिभीषन पाई॥ नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥३॥ इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशाको जा रहा है और मानो लड्ढ्ा विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा॥ ३॥ यह सपना मैं कहडेँ पुकारी। होइहि सत्य. गए दिन चारी॥ तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥ ४॥ ३२ * थ्रीरामचरितमानस * मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्र चार (कुछ ही ) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं ॥ ४॥ [दोहा ११] जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहे निसिचर पोच॥ तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा॥ ११॥ त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तें मोरी॥ तजों देह करू बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ १॥ सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं--हे माता! तू मेरी विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्ाय हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता॥ १॥ आनि काठ रच्ु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुने को भ्रवन सूल सम बानी॥ २॥ काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी ! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने 2॥ २॥ * सुन्दरकाण्ड * ३३ सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥ निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ ३॥ सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने कहा--] हे सुकुमारी ! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी॥ ३॥ कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥ देस्विअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवबत एकऊ तारा॥।॥ ४ ॥। सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं--[ क्या करूँ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाशमें अंगारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी तारा नहीं आता॥ ४॥ पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहूँ मोहि. जानि हतभागी॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य. नाम करू हरू मम सोका॥। ९ ।। चन्द्रमा अग्रिमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष ! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर॥ ५॥ ३४ * श्रीरामचरितमानस * नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥६॥ तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्रिके समान हैं। अग्नि दे, विरह- रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक न पहुँचा) । सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमानूजीको कल्पके समान बीता॥ ६॥ [सोरठा १२] कपि करि हृदय बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब। जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेड॥ तब हनुमान्जीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने ] अँगूठी डाल दी, मानो अशोकने अंगारा दे दिया। [यह समझकर] सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया॥ १२॥ तब देखी मद्विका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥ चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयेँ अकुलानी॥ १॥ तब उन्होंने राम-नामसे अद्भित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं॥ १॥ जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥ * सुन्दरकाण्ड * ३५ सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेड हनुमाना॥ २॥ [वे सोचने लगीं--] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमानजी मधुर वचन बोले--॥ २॥ रामचंद्र गुन बरनें लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥ लागीं सुनें भ्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥३॥ वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमानूजीनी आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥ ३॥ श्रवनामृत जेहिं. कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ।॥ ४॥ [सीताजी बोलीं--] जिसने कानोंके लिये अमृतरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता ? तब हनुमानजी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ॥ ४॥ ३६ * श्रीरामचरितमानस * राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य. सपथ करुनानिधान की॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहूँ सहिदानी॥ ७ ॥ [हनुमानूजीने कहा--] हे माता जानकी ! मैं श्रीरामजीका दूत हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीगरमजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है॥५॥ नर बानरहि संग कहु केैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥ [सीताजीने पूछा-- ] नर और वानरका सड़ कहो कैसे हुआ ? तब हनुमानजीने जैसे सड़ हुआ था, वह सब कथा कही ॥ ६॥ [दोहा १३] कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास। जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ हनुमानजीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और वचनसे कृपासागर श्रीरघुनाथजीका दास है॥ १३॥ हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु॒तात मो कहूँ जलजाना॥ १॥ भगवान्का जन (सेवक) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त * सुन्दरकाण्ड * ३७ पुलकित हो गया। [सीताजीने कहा--] हे तात हनुमान्! विरहसागरमें डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए॥ १॥ अब कहु कुसल जाउें बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खारारी॥ कोमलचित . कृपाल . रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥२॥ मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित खरके शत्रु सुखधाम प्रभुका कुशल-मड़ल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमलहदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है ?॥२॥ सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँऊ सुरति करत रघुनायक॥ कबहूँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निररित्र स्थाम मृदु गाता॥ ३॥ सेवकको सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अड्जोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे ?॥ ३॥ बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हों निपट बिसारी॥। देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ ४॥ [मुँहसे ] वचन नहीं निकलता, नेत्रोंमें [विरहके आँसुओंका ] ३८ * थ्रीरामचरितमानस * जल भर आया। [बड़े दुःखसे वे बोलीं--] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर हनुमानजी कोमल और विनीत वचन बोले-- ॥ ४॥ मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥। जनि जननी मानहु जिये ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम के दूना॥५॥ है माता! सुन्दर कृपाके धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजीके सहित [शरीरसे ] कुशल हैं, परन्तु आपके दु:खसे दुःखी हैं। हे माता! मनमें ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)। श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें आपसे दूना प्रेम है॥ ५॥ [दोहा १४] रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥ है माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजीका संदेश सुनिये। ऐसा कहकर हनुमानजी प्रेमसे गढ़द हो गये। उनके नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥ १४॥ कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहूँ सकल भए बिपरीता॥ नव तरू किसलय मनहूँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥ १॥ [हनुमानजी बोले--] श्रीरामचन्द्रजीने कहा है कि हे सीते ! तुम्हारे वियोगमें मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं। वक्षोंके नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्नरिके समान, रात्रि * सुन्दरकाण्ड * ३९ कालरात्रिके समान, चन्द्रमा सूर्यके समान॥१॥ कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥। जे हित रहे करत तेह पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ २॥ और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु साँपके श्रासके समान (जहरीली और गरम) हो गयी है॥२॥ कहेहू तें कछ दुख घटि होई। काहि कहां यह जान न कोई॥ तत्व प्रेम कर मम अरू तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ ३॥ मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे ? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है॥३॥ सो मनु सदा रहत तोहि पाहोीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥ प्रभु संदेस सुनत बेैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ ४॥ और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेमका सार इतनेमें ही समझ ले। प्रभुका सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेममें मग्र हो गयीं। उन्हें शरीरकी सुध न रही॥ ४॥ ४० * थ्रीरामचरितमानस * कह कपि हृदय धीर धरू माता। सुमिरू राम सेवक सुखदाता॥। उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ ५॥ हनुमानूजीने कहा-हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो। श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताकों हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो॥५॥ [दोहा १५] निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदय धीर धरूु जरे निसाचर जानु॥ राक्षसोंक समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण अग्रिके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और राक्षतोंको जला ही समझो॥ १५॥ जौं रघुबीर होति स॒ुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥ राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहूँ जातुधान की॥१॥ श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी ! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ?॥ १॥ अबहिं मातु मैं जाडें लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥ * सुन्दरकाण्ड * ४१२ कछुक दिवस जननी धरू धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥ २॥ हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन)-की आज्ञा नहीं है। [अतः ] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरोंसहित यहाँ आवेंगे॥ २॥ निसिचर मारि तोहि ले जेैहहिं। तिहूँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधथान अति भट बलवाना॥ इ॥ और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने कहा--] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन््हें-नन््हें-से ) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान योद्धा हैं॥३॥ मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥ ४॥ अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे।] यह सुनकर हनुमानूजीने अपना शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु)-के आकारका (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था॥४॥ ४२ * श्रीरामचरितमानस * सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥ ५॥ तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥ [दोहा १६] सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवानको मार सकता है)॥ १६॥ मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥ आसिष दीन्हि. रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥ १॥ भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमानूजीकी वाणी सुनकर सीताजीके मनमें सनन््तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय जानकर हनुमानूजीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शीलके निधान होओ॥ १॥ अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहूँ बहुत रघुनायक छोहू॥ करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ २॥ हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके * सुन्दरकाण्ड * ४३ खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें। ' प्रभु कृपा करें' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेममें मग्र हो गये॥ २ ॥ बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥। अब कृतकृत्य भयडें मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥ ३॥ हनुमानूजीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा-हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है॥ ३ ॥ सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देरित्र सुंदर फल रूखा॥ सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी ॥ ४॥। हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है। [सीताजीने कहा--] हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वनकी रखवाली करते हैं॥४॥ तिन्ह कर भय माता मोहि नाहोीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥ ५॥ [हनुमानूजीने कहा--] है माता! यदि आप मनमें सुख मानें (प्रसन्न होकर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है॥५॥ [दोहा १७] देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदय धरि तात मधुर फल खाहु॥ ४४ * श्रीरामचरितमानस * हनुमानूजीको बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकीजीने कहा-जाओ। हे तात! श्रीरघुनाथजीके चरणोंको हृदयमें धारण करके मीठे फल खाओ॥ १७॥ चअलेउठ नाइ सिरू पैठेउ बागा। फल खाएसि तरू तोरें लागा॥ रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछ जाइ पुकारे॥ १॥ वे सीताजीको सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये। फल खाये और वृक्षोंको तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे। उनमेंसे कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावणसे पुकार की--॥ १॥ नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं. असोक बाटिका उजारी॥ खाएसि फल अरू बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥ २॥ [और कहा--] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोकवाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षोंको उखाड़ डाला और रखवालोंको मसल-मसलकर जमीनपर डाल दिया॥ २॥ स॒ुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि. देसरित्र गर्जेड हनुमाना॥ सब रजनीचर _ कपि संघारे। गए पुकारत कछु अथधमारे॥ ३॥ यह सुनकर रावणने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर हनुमानजीने गर्जना की। हनुमानजीने सब राक्षसोंको मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये॥ ३॥ * सुन्दरकाण्ड * डण् पुनि पठयउठ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग ले सुभट अपारा॥ आवत देरित्र बिटप गहि तर्जा। ताहि. निपाति महाथधुनि गर्जा॥ ४॥ फिर रावणने अक्षयकुमारको भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओंको साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमानूजीने एक वृक्ष [हाथमें] लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि (बड़े जोर)-से गर्जगा की ॥ ४॥ [दोहा १८] कछु मारेसि कछु मर्देसि कछ मिलएसि धरि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ उन्होंने सेनामें कुछको मार डाला और कुछको मसल डाला और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया। कुछने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान है॥ १८ ॥ स॒ुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥। मारसि जनि सुत बाँशरेसु ताही। देसिविआ कपिहि कहाँ कर आही॥ १॥ पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने [अपने जेठे पुत्र] बलवान् मेघनादको भेजा। (उससे कहा कि-) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदरको देखा जाय कि कहाँका है॥१॥ चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥ ४६ * थ्रीरामचरितमानस * कपि देखा दारुनल भट आवा। कटकटाइ_ गर्जा अरू धावा॥२॥ इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमानूजीने देखा कि अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े॥ २॥ अति बिसाल तरू एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥ रहे. महाभट ताके. संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥ ३॥ उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहारसे | लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया (रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया) | उसके साथ जो बड़े- बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमानजी अपने शरीरसे मसलने लगे॥ ३॥ तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहूँ गजराजा॥ मुठिका मारि चढ़ा तरू जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥ ४॥ उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे। [लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये हों। हनुमानजी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी॥ ४॥ * सुन्दरकाण्ड * ४७9 उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥ ५॥। फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे जीते नहीं जाते॥ ५॥ [दोहा १९] ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं न ब्रह्मसासर मानउऊँ महिमा मिट॒ह अपार॥ अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन््धान (प्रयोग) किया, तब हनुमानजीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥ १९॥ बहाबान कपि कहूँ तेहिं मारा। परतिहूँ बार कटकु संघारा॥ तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै. गयऊ॥ १॥ उसने हनुमान्जीको ब्रह्मगाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमानजी मूच्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया॥ १॥ जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ तासु दूत कि बंध तरू आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बंधावा।॥ २॥ [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी ! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण )-के बन्धनको काट ४८ * श्रीरामचरितमानस * डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है ? किन्तु प्रभुके कार्यके लिये हनुमान्जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया॥ २॥ कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभा सब आए॥ दसमुख सभा दीरिब कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥ ३॥ बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये (तमाशा देखनेके लिये) सब सभामें आये। हनुमानूजीने जाकर रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती॥ ३॥ कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भकुटि बिलोकत सकल सभीता॥ देरित्र प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥ ४॥ देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नप्रताके साथ भयभीत हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशड्ढ खड़े रहे, जैसे सर्पोके समूहमें गरुड़ निःशड्डू (निर्भय) रहते हैं॥ ४॥ [दोहा २०] कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदय बिषाद॥ हनुमानजीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। * सुन्दरकाण्ड * ४९ फिर पुत्र-वधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया॥ २०॥ कह लंकेस कवन तें कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥ की थौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखे अति असंक सठ तोही॥ १॥ लड्जाापति रावणने कहा-रे वानर! तू कौन है? किसके बलपर तूने वनको उजाड़कर नष्ट कर डाला ? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे अत्यन्त निःशड्डू देख रहा हूँ॥१॥ मारे निसिचर केहिं. अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥ सुनु रावन ब्रह्मांड. निकाया। पाह जासु बल बिरचति माया॥ २॥ तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जानेका भय नहीं है ? [हनुमानूजीने कहा-- ] हे रावण ! सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहोंकी रचना करती है;॥ २॥ जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सजत हरत दससीसा॥ जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥ ३॥ जिनके बलसे हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः ) ७० * श्रीरामचरितमानस * सृष्टिका सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बलसे सहस्रमुख (फण्णों)-वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्माण्डको सिरपर धारण करते हैं;॥३॥ धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥ हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नूप दल मद गंजा॥ ४॥ जो देवताओंकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्खोको शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ डाला और उसीके साथ राजाओंके समूहका गर्व चूर्ण कर दिया॥ ४॥ खर दूषन त्रिसिरा अरू बाली। ब्ये सकल अतुलित बलसाली॥ ५ ॥ जिन्होंने खर, दूषण, त्रिेशिरा और बालिको मार डाला, जो सब-के-सब अतुलनीय बलवान थे;॥५॥ [दोहा २१] जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ जिनके लेशमात्र बलसे तुमने समस्त चराचर जगत्को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम [चोरीसे] हर लाये हो, मैं उन्हींका दूत हूँ॥२१॥ जानऊँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥ * सुन्दरकाण्ड * ५१ समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ १॥ मैं तुम्हारी प्रभुताकों खूब जानता हूँ, सहस्नबाहुसे तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमानूजीके [मार्मिक] वचन सुनकर रावणने हँसकर बात टाल दी॥ १॥ खायडें फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेडें रूखा॥ सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ २॥ हे [राक्षसोंके ] स्वामी ! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने 'फल खाये और वानर-स्वभावके कारण वक्ष तोड़े। हे (निशाचरोंके) मालिक! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्गपर चलनेवाले (दुष्ट ) राक्षस जब मुझे मारने लगे॥ २॥ जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँथेउें तनयेँ तुम्हारे॥ मोहिन कछ बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहडें निज प्रभु कर काजा॥ ३॥ तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उसपर तुम्हारे पुत्रने मुझको बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभुका कार्य किया चाहता हूँ॥ ३ ॥ बिनती करें जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥। ५२ * थ्रीरामचरितमानस * देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥ ४॥ हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो | तुम अपने पवित्र कुलका विचार करके देखो और भ्रमको छोड़कर भक्तभयहारी भगवान्को भजो॥ ४॥ जाकें डर अति काल छडेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥ तासों बयरू कबहूँ नहिं कीजे। मोरे कहें जानकी दीजे॥५॥। जो देवता, राक्षत और समस्त चराचरको खा जाता है, वह काल भी जिनके डरसे अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वबैर न करो और मेरे कहनेसे जानकीजीको दे दो॥५॥ [दोहा २२] प्रततपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि। गए सरन प्रभु राखिहँ तव अपराध बिसारि॥ खरके शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके समुद्र हैं। शरण जानेपर प्रभु तुम्हाशा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरणमें रख लेंगे॥ २२॥ राम चरन पकज उर छथ्रहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥ रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥ १॥ तुम श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करो और लड्ढडाका अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजीका यश निर्मल * सुन्दरकाण्ड * ण्रे चन्द्रमाके समान है। उस चन्द्रमामें तुम कलंक न बनो॥ १॥ राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥ बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥ २॥ रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोहको छोड़, विचारकर देखो। हे देवताओंके शत्रु) सब गहनोंसे सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी कपड़ोंके बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती॥ २॥ राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहोीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं॥ ३॥ रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पानेके समान है। जिन नदियोंके मूलमें कोई जलस्नोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केबल बरसातका ही आसरा है) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं॥ ३॥ सुनु दसकंठ कहडें पन रोपी। बिसुख राम त्राता नहिं कोपी॥ संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न रासि्त्रि राम कर द्वरोही॥ ४॥ हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुखकी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा डे * थ्रीरामचरितमानस * भी श्रीरामजीके साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते ॥ ४॥ [दोहा २३] मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ॥ २३ ॥ जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥। बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥ १॥ यद्यपि हनुमानजीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी हुई बहुत ही हितकी वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी रावण बहुत हँसकर (व्यंगसे) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला!॥ १॥ मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥। उलटा होइहि. कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥ २॥ रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम! मुझे शिक्षा देने चला है। हनुमानूजीने कहा--इससे उलटा ही होगा (अर्थात् मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं)। यह तेरा मतिश्रम (बुद्धिका फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है॥ २॥ * सुन्दरकाण्ड * जज सुनि कपषि बचन बहुत स्िविसिआना। वेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥ सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥ ३॥ हनुमानूजीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया [और बोला--] अरे! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते ? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय ममन्त्रियोंके साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे॥ ३॥ नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥ आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥ ४॥ उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है। हे गोसाईं ! कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सबने कहा-भाई ! यह सलाह उत्तम है॥ ४॥ सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥ ५॥। यह सुनते ही रावण हँसकर बोला--अच्छा तो, बंदरको अंग-भंग करके भेज (लौटा) दिया जाय॥५॥ [दोहा २४] कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहडें समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर ५६ * श्रीरामचरितमानस * होती है। अतः तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर फिर आग लगा दो॥ २४॥ पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लड्ड आइहि॥ जिनन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखे मैं तिनह कै प्रभुताई॥ १॥ जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ (अपने स्वामीके पास) जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता (सामर्थ्य) तो देखूँ!॥ १॥ बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भह्ट सहाय सारद मैं जाना॥ जातुधान स॒ुनि रावन बचना। लागे रवें मूढ़ सोड रचना॥ २॥ यह वचन सुनते ही हनुमानजी मनमें मुसकराये [ और मन- ही-मन बोले कि] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि देनेमें| सहायक हुई हैं। रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही (पूँछमें आग लगानेकी) तैयारी करने लगे॥२॥ रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूछ कीन्ह कपि खेला॥ कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहें चरन करहिं बहु हॉँसी॥ ३॥ [पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि] * सुन्दरकाण्ड * ० नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमान्जीने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी) | नगरवासी लोग तमाशा देखने आये। वे हनुमानजीको पैरसे ठोकर मारते हैं और उनकी बहुत हँसी करते हैं॥३॥ बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥ पावक जरत देखरिव्र हनुमंता। भयउठ परम लघुरूप तुरंता॥ ४॥ ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमान्जीको नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्नरिको जलते हुए देखकर हनुमानजी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये॥ ४॥ निब॒ुकि चढ़ेठ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं॥ ५॥ बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े। उनको देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं॥ ५॥ [दोहा २५] हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टटहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥ उस समय भगवान्की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे। हनुमानजी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाशसे जा लगे॥ २५॥ देह बिसाल परम हरूआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥ जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥ १॥ ५८ * थ्रीरामचरितमानस * देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं॥१॥ तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं. अवसर को हमहि उब्बारा॥ हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरेें सुर कोई॥२॥ हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा ? [चारों ओर] यही पुकार सुनायी पड़ रही है। हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता है।॥२॥ साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥ जारा नगरू निमिष एक माहोीं। एक बिभीषन कर गृह नाही॥ ३॥ साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी तरह जल रहा है। हनुमानजीने एक ही क्षणमें सारा नगर जला डाला। एक विभीषणका घर नहीं जलाया॥ ३॥ ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥। उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥ ४॥ * सुन्दरकाण्ड * ५९ [शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती ! जिन्होंने अग्निको बनाया, हनुमानजी उन्हींके दूत हैं। इसी कारण वे अग्रिसे नहीं जले। हनुमानूजीने उलट-पलटकर (एक ओरसे दूसरी ओरतक) सारी लड्ज्ा जला दी। फिर वे समुद्रमें कूद पड़े॥ ४॥ [दोहा २६] पूँछ बुझाइ खोड श्रम धरि लघु रूप बहोरि। जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउठ कर जोरि॥ पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोया-सा रूप धारण कर हनुमानजी श्रीजानकीजीके सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए॥ २६॥ मातु मोहि दीजे कछ चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥ चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लबयबऊ॥ १॥ [हनुमानूजीने कहा--] है माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया॥ १॥ कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु प्रनकामा॥। दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥ २॥ [जानकीजीने कहा--] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना-हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकारसे पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकारकी कामना नहीं है), तथापि ६० * श्रीरामचरितमानस * दीनों (दुःखियों)-पर दया करना आपका विरद है [और मैं दीन हूँ] अत: उस विरदको याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकटको दूर कीजिये॥ २॥ तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥ मास दिवस महूँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥ ३॥ हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्तकी कथा (घटना) सुनाना और प्रभुको उनके बाणका प्रताप समझाना [स्मरण कराना]। यदि महीनेभरमें नाथ न आये तो फिर मुझे जीती न पायेंगे॥ ३॥ कहु कपि केहि बिधि राखों प्राना। तुम्हह् तात कहत अब जाना॥ तोहि. देरिब सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहूँ सोड दिनु सो राती॥ ४॥ हे हनुमान्! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जानेको कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!॥ ४॥ [दोहा २७] जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह। चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥ हनुमानूजीने जानकीजीको समझाकर बहुत प्रकारसे धीरज दिया और उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर श्रीरामजीके पास गमन किया॥ २७॥ * सुन्दरकाण्ड * ६१ चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥ नाधि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥ १॥ चलते समय उन्होंने महाध्वनिसे भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे। समुद्र लाँघकर वे इस पार आये और उन्होंने वानरोंको किलकिला शब्द (हर्षध्वनि) सुनाया॥ १॥ हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तदब जाना।॥। मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥ २॥ हनुमानूजीको देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरोंने अपना नया जन्म समझा। हनुमानूजीका मुख प्रसन्न है और शरीरमें तेज विराजमान है, [जिससे उन्होंने समझ लिया कि] ये श्रीरामचन्द्रजीका कार्य कर आये हैं॥ २॥ मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥ चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछतः कहत नवल इतिहासा॥ ३॥ सब हनुमानूजीसे मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछलीको जल मिल गया हो। सब हर्षित होकर नये-नये इतिहास (वृत्तान्त) पूछते-कहते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ ३॥ ६२ * थ्रीरामचरितमानस * तब मध्ुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥ रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहारा हनत सब भागे॥ ४॥ तब सब लोग मधुवनके भीतर आये और अंगदकी सम्मतिसे सबने मधुर फल [या मधु और फल] खाये। जब रखवाले बरजने लगे, तब घूँसोंकी मार मारते ही सब रखवाले भाग छूटे॥ ४॥ [दोहा २८] जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज। सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥ उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभुका कार्य कर आये हैं॥ २८ ॥ जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥ एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥ १॥ यदि सीताजीकी खबर न पायी होती तो क्या वे मधुवनके फल खा सकते थे? इस प्रकार राजा सुग्रीव मनमें विचार कर ही रहे थे कि समाजसहित वानर आ गये॥ १॥ आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥ * सुन्दरकाण्ड * ६३३ पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥ २॥ सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरोंने उत्तर दिया-- ] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल है। श्रीरामजीकी कृपासे विशेष कार्य हुआ (कार्यमें विशेष सफलता हुई है) ॥ २॥ नाथ काजु कीन्हेड हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥ सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥ ३॥ हे नाथ! हनुमान्ने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमानूजीसे फिर मिले और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ ३॥ राम कपिन्ह जब आवत देखा | किए काजु मन हरष बिसेषा॥ फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥ ४॥ श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब उनके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े॥ ४॥ [दोहा २९] प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज। पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥ द्द्ड * श्रीरामचरितमानस * दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी। [वानरोंने कहा--] हे नाथ! आपके चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है॥ २९॥ जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥ ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥ १॥ जाम्बवानने कहा--हे रघुनाथजी ! सुनिये। हे नाथ! जिसपर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं॥१॥ सोडइ बिजई बिनई गुन॒ सागर। तासु सुजसू त्रैलोक उजागर॥ प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजूवा॥ २॥१॥॥ वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन जाता है। उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है। प्रभुको कृपासे सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया॥ २॥ नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहूँ मुख न जाइ सो बरनी॥ प्रवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥ ३॥ है नाथ! पवनपुत्र हनुमानूने जो करनी की, उसका हजार * सुन्दरकाण्ड * ६५ मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवानने हनुमानजीके सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजीको सुनाये॥ ३॥ सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियेँ लाए॥ कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥ ४॥ [वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमानूजीको फिर हृदयसे लगा लिया और कहा-हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं ?॥ ४॥ [दोहा ३०] नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥ (हनुमानूजीने कहा-- ) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रोंकी अपने चरणोंमें लगाये रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायूँ तो किस मार्गसे 2॥ ३०॥ चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदय लाइ सोइड लीन्ही॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥ १५॥। चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [ उतारकर] दी। श्रीरघुनाथजीने उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [हनुमानूजीने फिर कहा--] है नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ वचन कहे-- ॥ १॥ ६६ * थ्रीरामचरितमानस * अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥ सन क्रम बच्चन चरन अनुरागी | केहि,. अपराध नाथ हों त्यागी॥२॥ छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [और कहना कि] आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले हैं और मैं मन, कर्म और वचनसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप) -ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया ?॥ २॥ अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥। नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥ ३॥ [हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं ॥ ३ ॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ नयन स्त्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥ ४॥ विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [ अग्नि और पवनका संयोग होनेसे] यह शरीर क्षणमात्रमें जल सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये (प्रभुका स्वरूप देखकर सुखी होनेके लिये) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरहकी आगसे भी देह जलने नहीं पाती॥ ४॥ * सुन्दरकाण्ड * ६७ सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं. कहें भलि दीनदयाला॥ ५॥ सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु ! वह बिना कही ही अच्छी है (कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा) ॥ ५॥ [दोहा ३१] निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्पके समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये॥ ३१॥ सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥ बचन कार्य मन मम गति जाही। सपनेहूँ बूझिआ बिपति कि ताही॥ १॥ सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंमें जल भर आया [और वे बोले--] मन, शरीर और वचनसे जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्रमें भी विपत्ति हो सकती है ?॥ १॥ कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तब सुमिरन भजन न होई॥ केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥ २॥ हनुमानूजीने कहा-हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब ६८ * श्रीरामचरितमानस * आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो ! राक्षस्रोंकी बात ही कितनी है ? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे॥ २॥ सुनु कषि तोहि समान उपकारी। नहिं कोठ सुर नर मुनि तनुधारी॥। प्रति उपकार करों का तोरा। सनमुख होड़ न सकत मन मोरा॥ ३॥ [ भगवान् कहने लगे--] हे हनुमान्! सुन; तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा प्रत्युपकार (बदलेमें उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता॥३॥ सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउे, करि बिचार मन माहीं॥ पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥४॥ हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [खूब] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उक्रण नहीं हो सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार- बार हनुमानजीको देख रहे हैं। नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है॥४॥ [दोहा ३२] सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥ प्रभुके वचन सुनकर और उनके [प्रसन्न] मुख तथा [पुलकित] अंगोंको देखकर हनुमानजी हर्षित हो गये और प्रेममें * सुन्दरकाण्ड * ६९ विकल होकर 'हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो” कहते हुए श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ ३२॥ लार बार प्रभु चहड़ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावषा॥ प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥ १॥ प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए हनुमानूजीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं। प्रभुका कर-कमल हनुमानूजीके सिरपर है। उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी प्रेममग्र हो गये॥ १॥ सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥। कपि उठाइ प्रभु हृदय लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥ २॥ फिर मनको सावधान करके शड्डूरजी अत्यन्त सुन्दर कथा कहने लगे--हनुमानूजीको उठाकर प्रभुने हृदयसे लगाया और हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया॥ २॥ कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥। प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥ ३॥ हे हनुमान्! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लड्ढा और उसके बड़े बाँके किलेको तुमने किस तरह जलाया ? हनुमानूजीने प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले-- ॥ ३॥ ७० * श्रीरामचरितमानस * साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥ नाधि सिंधु हाटकपु जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥ ४॥ बंदरका बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डालसे दूसरी डालपर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँघचकर सोनेका नगर जलाया और राक्षसगणको मारकर अशोकवनको उजाड़ डाला, ॥ ४॥ सो सब तव॒ प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥५॥ यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी ! आपहीका प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है॥५॥ [दोहा ३३] ता कहूँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल। तब प्रभाव बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥ हे प्रभु| जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभावसे रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है] बड़वानलको निश्चय ही जला सकती है (अर्थात् असम्भव भी सम्भव हो सकता है) ॥ ३३॥ नाथ भगति अति सुखदायनी। देह कृपा करि अनपायनी॥ सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेड भवानी॥ १॥ है नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा * सुन्दरकाण्ड * 9१ करके दीजिये। हनुमानूजीकी अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे भवानी ! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा॥ १॥ उम्ाा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइड पावा॥ २॥ है उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती! यह स्वामी-सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति पा गया॥ २॥ सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबूंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा ॥। तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलें कर करहु बनाया॥ ३॥। प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे--कृपालु आनन्दकन्द श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो! तब श्रीरघुनाथजीने कपिराज सुग्रीवको बुलाया और कहा--चलनेकी तैयारी करो ॥ ३॥ अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिनन््ह कहूँ आयसु दीजे॥ कौतुक देखरि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥ ४॥ अब विलम्ब किस कारण किया जाय? वानरोंको तुरंत ७२ * श्रीरामचरितमानस * आज्ञा दो। [भगवान्की] यह लीला (रावणवधकी तैयारी) देखकर, बहुत-से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाशसे अपने-अपने लोकको चले ॥ ४॥ [दोहा ३४] कपिपति बेगि बोलाएं आए जूथप जूथ। नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥॥। वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही वानरोंको बुलाया, सेनापतियोंके समूह आ गये। वानर-भालुओंके झुंड अनेक रंगोंके हैं और उनमें अतुलनीय बल है॥ ३४॥ प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥ देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥२१॥ वे प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाते हैं। महान् बलवान् रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्रीरामजीने वानरोंकी सारी सेना देखी। तब कमललनेत्रोंसे कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली॥ १॥ राम कृपा बल पाड़ कपिंदा। भए. पच्छजुत मनहूँ गिरिंदा॥ हरणषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन॒ भए सुंदर सुभ नाना॥२॥ रामकृपाका बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गये। तब श्रीरामजीने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया। अनेक सुन्दर और शुभ शकुन हुए॥ २॥ * सुन्दरकाण्ड * 9३ जासु सकल मंगलमय कोीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥ प्रभु पयान जाना बेठेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥ ३॥ जिनकी कीर्ति सब मड़लोंसे पूर्ण है, उनके प्रस्थानके समय शकुन होना, यह नीति है (लीलाकी मर्यादा है)। प्रभुका प्रस्थान जानकीजीने भी जान लिया। उनके बायें अड़ फड़क-फड़ककर मानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं]॥३॥ जोडइ जोडह सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउठ रावनहि. सोई॥ चला कटकु को बरनें पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥ ४॥ जानकोजीको जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावणके लिये अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है ? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं ॥ ४॥ नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इउलच्छाचारी॥ केहरिनाद भालु कपि करहोीं। डगमगाहिं. दिग्गज. चिक्ररहीं॥ ५॥ नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलनेवाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षोंको धारण किये कोई आकाशमार्गसे और कोई पृथ्वीपर चले जा रहे हैं। वे सिंहके समान गर्जना कर रहे हैं। [उनके चलने और गज॑नेसे ] दिशाओंके हाथी विचलित होकर चिग्घाड़ रहे हैं॥ ५॥ ७9४ * श्रीरामचरितमानस * [छन््द १] चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे ॥ कटकट6टिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ॥। दिशाओंके हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चञ्जल हो गये (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब-के-सब मनमें हर्षित हुए कि [अब] हमारे दुःख टल गये। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'प्रबलप्रताप कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो ' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहोंको गा रहे हैं ॥ १॥ [छन््द २] सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पपाज सो लिखत अबिचल पावनी॥ उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्) सर्पराज शेषजी भी सेनाका बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छपकी कठोर पीठको दाँतोंसे पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात् बार-बार दाँतोंको गड़ाकर कच्छपकी पीठपर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दर प्रस्थानयात्राको परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथाको सर्पराज शेषजी कच्छपको पीठपर लिख रहे हों॥ २॥ * सुन्दरकाण्ड * हि [दोहा ३५] एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ इस प्रकार कृपानिधान श्रीरामजी समुद्रतटपर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥ ३५॥ उहाँ निसाचर रहहिं. ससंका। जब तें जारि गयउठ कपि लंका॥ निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिें निसिच्र कुल केर उब्बारा॥ १॥ वहाँ (लड्ढ्में) जबसे हनुमानजी लड्डाको जलाकर गये, तबसे राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरोंमें सब विचार करते हैं कि अब राक्षसकुलकी रक्षा [-का कोई उपाय] नहीं है॥ १॥ जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आए. पुर कवन भलाई॥ दूतिन्न सन सुनि पुरजन बानी। मंदोददी अधिक अकुलानी॥ २॥ जिसके दूतका बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगरमें आनेपर कौन भलाई है (हमलोगोंकी बड़ी बुरी दशा होगी) ? दूतियोंसे नगरनिवासियोंके वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत ही व्याकुल हो गयी॥ २॥ रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बच्चन नीति रस पागी॥ कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हिये धरहू॥ ३॥ ७६ * थ्रीरामचरितमानस * वह एकान्तमें हाथ जोड़कर पति (रावण)-के चरणों लगी और नीतिरसमें पगी हुई वाणी बोली-हे प्रियतम ! श्रीहरिसे विरोध छोड़ दीजिये। मेरे कहनेको अत्यन्त ही हितकर जानकर हृदयमें धारण कीजिये॥ ३॥ समुझत जासु दूत कड्ड करनी। स्त्रवहि,ं. गर्भ रजनीचर घरनी॥ तासु. नारिनिज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥ ४॥ जिनके दूतकी करनीका विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी ! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मन्त्रीको बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्रीको भेज दीजिये॥ ४॥ तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आईं॥ सुनहु नाथ सीता बिनु दोील्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥ ५॥ सीता आपके कुलरूपी कमलोंके वनको दुःख देनेवाली जाड़ेकी रात्रिके समान आयी है। हे नाथ! सुनिये, सीताको दिये (लौटाये ) बिना शम्भु और ब्रह्मके किये भी आपका भला नहीं हो सकता॥ ५॥ [दोहा ३६] राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥ श्रीरमजीके बाण सर्पोके समूहके समान हैं और राक्षसोंके * सुन्दरकाण्ड * 9७ समूह मेढकके समान। जबतक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल नहीं जाते) तबतक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये॥ ३६॥ श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥ सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महूँ भय मन अति काचा॥ १॥ मूर्ख और जगत्प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानोंसे उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा [और बोला--] स्त्रियोंका स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है। मड़लमें भी भय करती हो! तुम्हारा मन (हृदय) बहुत ही कच्चा (कमजोर) है॥१॥ जों आवहई मर्कटट. कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥ कंपहि,।. लोकप जाकीं त्रासरा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥ २॥ यदि वानरोंकी सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना जीवननिर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डरसे काँपते हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसीकी बात है॥२॥ अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभा ममता अधिकाई॥ मंदोदी हृदय कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥ ३॥ रावणने ऐसा कहकर हँसकर उसे हृदयसे लगा लिया और ७८ * श्रीरामचरितमानस * ममता बढ़ाकर (अधिक ख्लेह दर्शाकर) वह सभामें चला गया। मन्दोदरी हृदयमें चिन्ता करने लगी कि पतिपर विधाता प्रतिकूल हो गये॥ ३॥ बैठेडठ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥ बूझेसि सच्चिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ठ करि रहहू॥ ४॥ ज्यों ही वह सभामें जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पायी कि शत्रुकी सारी सेना समुद्रके उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि उचित सलाह कहिये [अब क्या करना चाहिये ?] | तब वे सब हँसे और बोले कि चुप किये रहिये (इसमें सलाहकी कौन-सी बात है?) ॥ ४॥ जितेहु सुरासुरु॒ तब श्रम नाहोीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥ ५॥ आपने देवताओं और राक्षसरोंको जीत लिया, तब तो कुछ श्रम ही नहीं हुआ। फिर मनुष्य और वानर किस गिनतीमें हैं 2॥ ५॥ [दोहा ३७] सचिव बैद गुर तीनि जौ प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ मन्त्री, वैद्य और गुरु-ये तीन यदि [अप्रसन्नताके] भय या [लाभकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] प्रिय बोलते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं); तो [क्रमशः ] राज्य, शरीर और धर्म--इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है॥ ३७॥ * सुन्दरकाण्ड * 9९ सोइ रावन कहूँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं. सुनाइ सुनाई॥ अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥१॥ रावणके लिये भी वही सहायता (संयोग) आ बनी है। मन्त्री उसे सुना-सुनाकर (मुँहपर) स्तुति करते हैं। [इसी समय] अवसर जानकर विभीषणजी आये। उन्होंने बड़े भाईके चरणोंमें सिर नवाया॥ १॥ पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाहई अनुसासन॥ जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहडेँ हित ताता॥२॥ फिर वे सिर नवाकर अपने आसनपर बैठ गये और आज्ञा पाकर ये वचन बोले--हे कृपालु | जब आपने मुझसे बात (राय) पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार आपके हितकी बात कहता हँ--॥ २॥ जो आपन चाहे कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥ सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई॥३॥ जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकारके सुख चाहता हो, वह हे स्वामी ! परस्त्रीके ललाटको ८० * थ्रीरामचरितमानस * चौथके चन्द्रमाकी तरह त्याग दे (अर्थात् जैसे लोग चौथके चन्द्रमाको नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्रीका मुख ही न देखे) ॥ ३॥ चऔदह भुवन एक पति होई। भूत द्रोह तिष्ठह नहिं सोई॥ गुन॒ सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥ ४॥। चौदहों भुवनोंका एक ही स्वामी हो, वह भी जीवोंसे वैर करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणोंका समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता॥ ४॥ [दोहा ३८] काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥ हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ--ये सब नरकके रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं॥ ३८॥ तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु. कर काला॥। ब्रह्मा अनामय अज भगवंता। व्यापक अजित अनादि अनंता॥ १॥ हे तात! राम मनुष्योंके ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकोंके स्वामी और कालके भी काल हैं। वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान् हैं; वे निगमय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं ॥१॥ * सुन्दरकाण्ड * ८१९ गो टद्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ २॥ उन कृपाके समुद्र भगवान्ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओंका हित करनेके लिये ही मनुष्य-शरीर धारण किया है। हे भाई | सुनिये, वे सेवकोंको आनन्द देनेवाले, दुष्टोंक समूहका नाश करनेवाले और वेद तथा धर्मकी रक्षा करनेवाले हैं॥२॥ ताहि. बयरू तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥ देहु नाथ प्रभु कहूँ बेदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥ ३॥ वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये। वे श्रीरघुनाथजी शरणागतका दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर)-को जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण ख्रेह करनेवाले श्रीरामजीको भजिये॥ ३॥ सरन गए प्रभु ताहु न त्यागा। बिसस््व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ जास नाम त्रयथ ताप नसावन। सोड प्रभु प्रगट समुझु जिये रावन॥ ४॥ जिसे सम्पूर्ण जगत्से द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण जानेपर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापोंका नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूपमें प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदयमें यह समझ लीजिये॥ ४॥ ८२ * थ्रीरामचरितमानस * [दोहा ३९ (क)] बार बार पद लागउें बिनय करे दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥ हे दशशीश! मैं बार-बार आपके चरणों लगता हूँ. और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मदको त्यागकर आप कोसलपति श्रीरामजीका भजन कीजिये॥ ३९ (क)॥ [दोहा ३९ (ख) ] मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरू तात॥ मुनि पुलस्त्यजीने अपने शिष्यके हाथ यह बात कहला भेजी है। हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु (आप) -से कह दी॥ ३९ (ख)॥ माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥ तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥ १॥ माल्यवान् नामका एक बहुत ही बुद्धिमान् मन्त्री था। उसने उन (विभीषण)-के वचन सुनकर बहुत सुख माना [और कहा--] हे तात! आपके छोटे भाई नीति-विभूषण (नीतिको भूषणरूपमें धारण करनेवाले अर्थात् नीतिमान्) हैं। विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदयमें धारण कर लीजिये॥ १॥ रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हड कोऊ॥ * सुन्दरकाण्ड * ८३३ माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥२॥ [रावणने कहा--] ये दोनों मूर्ख शत्रुकी महिमा बखान रहे हैं। यहाँ कोई है ? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान् तो घर लौट गया और विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे--॥ २॥ सुमति कुमति सब के उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहों॥ जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ ३॥ हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदयमें रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकारकी सम्पदाएँ (सुखकी स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाममें विपत्ति (दुःख) रहती है ॥ ३ ॥ तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥ कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि. सीता पर प्रीति घनेरी॥ ४॥ आपके हृदयमें उलटी बुद्धि आ बसी है। इसीसे आप हितको अहित और शश्रुको मित्र मान रहे हैं। जो राक्षसकुलके लिये कालरात्रि [-के समान] हैं, उन सीतापर आपकी बड़ी प्रीति है॥ ४॥ [दोहा ४०] तात चरन गहि मागउँँ राखहु मोर दुलार। सीता देहु राम कहूँ अहित न होइ तुम्हार॥ ८४ * श्रीरामचरितमानस * हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ) कि आप मेरा दुलार रखिये (मुझ बालकके आग्रहको स्नेहपूर्वक स्वीकार कीजिये) । श्रीरामजीको सीताजी दे दीजिये, जिसमें आपका अहित न हो॥ ४०॥ बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥ सुनत दसानन उठा. रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥१५॥ विभीषणने पण्डितों, पुराणों और वेदोंद्वारा सम्मत (अनुमोदित) वाणीसे नीति बखानकर कही। पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ गयी है!॥ १॥ जिअसि सदा सठ मोर जिआवबा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥ कहसि न खल अस को जग माहों। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥२॥ ओरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात् मेरे ही अन्नसे पल रहा है), पर हे मूढ़! पक्ष तुझे शत्रुका ही अच्छा लगता है। अरे दुष्ट! बता न, जगत्में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओंके बलसे न जीता हो 2॥ २॥ मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिनन््हहि कहु नीती॥ अस कहि कीन्न्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥ ३॥ * सुन्दरकाण्ड * ८५ मेरे नगरमें रहकर प्रेम करता है तपस्वियोंपर। मूर्ख! उन्हींसे जा मिल और उन्हींको नीति बता। ऐसा कहकर रावणमने उन्हें लात मारी। परन्तु छोटे भाई विभीषणने (मारनेपर भी) बार-बार उसके चरण ही पकड़े॥ ३॥ उमा संत कह इहड बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥ तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥ ४॥ [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! संतकी यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करनेपर भी [बुराई करनेवालेकी ] भलाई ही करते हैं। [विभीषणजीने कहा--] आप मेरे पिताके समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजीको भजनेमें ही है॥ ४॥ सचिव संग ले नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कह्त अस भयऊ।)।। ५ ॥। [इतना कहकर] विभीषण अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर आकाशमार्गमें गये और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे-- ॥ ५॥ [दोहा ४१] रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मैं रघुबीर सरन अब जाउें देहु जनि खोरि॥ श्रीरमजी सत्यसंकल्प एवं [सर्वसमर्थ] प्रभु हैं और [हे रावण!] तुम्हारी सभा कालके वश है। अतः मैं अब श्रीरघुवीरकी शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना॥४१॥ अस कहि चला बिभीषनु जबहों। आयू हीन भए सब तबहीं॥ ८६ * थ्रीरामचरितमानस * साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥१॥ ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये (उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी)। [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! साधुका अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याणकी हानि (नाश) कर देता है॥१॥ रावन जबहिं बविभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥ चलेउठ हरषि रघुनायक पाहों। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥ २॥ रावणने जिस क्षण विभीषणको त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव (ऐश्वर्य)-से हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित होकर मनमें अनेकों मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ २॥ देखिह्ें जाइ चरन जलजाता। अरुून मृदुल सेवक सुखदाता॥। जे पद परसि तरी रिषिनारी। दडक कानन पावनकारी॥ इ॥ [वे सोचते जाते थे--] मैं जाकर भगवान्के कोमल और लाल वर्णके सुन्दर चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले हैं, जिन चरणोंका स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्या तर गयीं और जो दण्डकवनको पवित्र करनेवाले हैं॥३॥ जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥ * सुन्दरकाण्ड * ८७9 हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य. मैं देखिहें. त्तेई॥ ४॥ जिन चरणोंको जानकीजीने हृदयमें धारण कर रखा है, जो कपटमृगके साथ पृथ्वीपर [उसे पकड़नेको] दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात् शिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हींको आज मैं देखूँगा॥४॥ [दोहा ४२] जिनन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहडें इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ जिन चरणोंको पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणोंको अभी जाकर इन नेत्रोंसे देखूँगा॥ ४२॥ एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउऊ सपदि सिंधु एहिं पारा॥ कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउठ रिपु दूत बिसेषा॥ १॥ इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्रके इस पार (जिधर श्रीरामचन्द्रजीकी सेना थी) आ गये। वानरोंने विभीषणको आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रुका कोई खास दूत है॥१॥ ताहि. राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥। कह सुग्रीव सुनह रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥२॥ * श्रीरामचरितमानस * उन्हें [पहरेपर] ठहराकर वे सुग्रीवके पास आये और उनको सब समाचार कह सुनाये। सुग्रीवने [ श्रीरामजीके पास जाकर] कहा--हे रघुनाथजी! सुनिये, रावणका भाई [आपसे ] मिलने आया है॥२॥ कह प्रभु सखा बूझिएे काहा। कहड कपीस सुनहु नरनाहा॥ जानि न जाहइ निसाचर माया। कामरूप केहि. कारन आया॥ ३॥ प्रभु श्रीरमजीने कहा-हे मित्र! तुम क्या समझते हो (तुम्हारी क्या राय है) ? वानरराज सुग्रीवने कहा--हे महाराज! सुनिये, राक्षस्रोंकी माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलनेवाला (छली) न जाने किस कारण आया है॥३॥ भेद हमार लेन सठ आवा। रासिविअ बाँधि मोहि अस भावा॥ सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥ ४॥ [जान पड़ता है] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है। इसलिये मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय। [ श्रीरीामजीने कहा--] हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी। परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागतके भयको हर लेना!॥ ४॥ सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥ (५ ॥। प्रभुके वचन सुनकर हनुमानजी हर्षित हुए [और मन-ही- * सुन्दरकाण्ड * ८९ मन कहने लगे कि] भगवान् कैसे शरणागतवत्सल (शरणमें आये हुएपर पिताकी भाँति प्रेम करनेवाले) हैं॥५॥ [दोहा ४३] सरनागत कहूँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ [ श्रीरीामजी फिर बोले-- ] जो मनुष्य अपने अहितका अनुमान करके शरणमें आये हुएका त्याग कर देते हैं, वे पामर (श्ुद्र) हैं, पापमय हैं; उन्हें देखनेमें भी हानि है (पाप लगता है) ॥ ४३ ॥ कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ. सरन तजउऊेँ नहिं ताहू॥ सनमुख होइड जीव मोहि जबहों। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ १॥ जिसे करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या लगी हो, शरणमें आनेपर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं॥१॥ पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥ जौं पै दुष्ट हृदय सोड होई। मोरें सनमुख आवब कि सोई॥२॥ पापीका यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। यदि वह (रावणका भाई) निश्चय ही दुष्ट हृदयका होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?॥२॥ निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥ ९० * श्रीरामचरितमानस * भेद लेन पठवा दससीसा। तबहँ न कछु भय हानि कपीसा॥ ३॥ जो मनुष्य निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-हछिद्र नहीं सुहाते। यदि उसे रावणने भेद लेनेको भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपनेको कुछ भी भय या हानि नहीं है॥३॥ जग महू सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महूँ तेते॥ जों सभीत आवा सरनाईं। रखिह्ें ताहि. प्रान की नाईं॥४॥ क्योंकि हे सखे! जगत्में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभरमें उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत होकर मेरे शरण आया है तो मैं उसे प्राणोंकी तरह रखूँगा॥ ४॥ [दोहा ४४] उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥ कृपाके धाम श्रीरामजीने हँसकर कहा-दोनों ही स्थितियोंमें उसे ले आओ। तब अंगद और हनुमान्सहित सुग्रीवजी 'कृपालु श्रीरामकी जय हो” कहते हुए चले ॥ ४४॥ सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥ दूरेिहि ते देखे टद्लौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥ २॥ * सुन्दरकाण्ड * ९१ विभीषणजीको आदरसहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणाकी खान श्रीरघुनाथजी थे। नेत्रोंको आनन्दका दान देनेवाले (अत्यन्त सुखद) दोनों भाइयोंको विभीषणजीने दूरहीसे देखा॥ १॥ बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥ भुज प्रलंब._ कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥ २॥ फिर शोभाके धाम श्रीरामजीको देखकर वे पलक [मारना] रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गये। भगवान्की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमलके समान नेत्र हैं और शरणागतके भयका नाश करनेवाला साँवला शरीर है॥२॥ सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित सदन मन मोहा |। नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥ ३॥ सिंहके-से कंधे हैं, विशाल वक्ष:स्थल (चौड़ी छाती) अत्यन्त शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवोंके मनको मोहित करनेवाला मुख है। भगवान्के स्वरूपको देखकर विभीषणजीके नेत्रोंमें [प्रेमाश्ुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। फिर मनमें धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे ॥ ३॥ नाथ दसानन कर में भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥ ९२ * श्रीरामचरितमानस * सहज पापप्रिय. तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥ ४॥ हे नाथ! मैं दशमुख रावणका भाई हूँ। हे देवताओंके रक्षक ! मेरा जन्म राक्षसकुलमें हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभावसे ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लको अन्धकारपर सहज ख्रेह होता है॥ ४॥ [दोहा ४५] श्रवन सुजसु सुनि आयडें प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥ मैं कानोंसे आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव (जन्म-मरण)-के भयका नाश करनेवाले हैं। हे दुःखियोंके दुःख दूर करनेवाले और शरणागतको सुख देनेवाले श्रीरघुवीर ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कोजिये॥ ४५॥ अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥। दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदय लगावा॥ १॥ प्रभुने उन्हें ऐसा कहकर दण्डवत् करते देखा तो वे अत्यन्त हर्षित होकर तुरंत उठे | विभीषणजीके दीन वचन सुननेपर प्रभुके मनको बहुत ही भाये। उन्होंने अपनी विशाल भुजाओंसे पकड़कर उनको हृदयसे लगा लिया॥ १॥ अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥। कह लंकेस. सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥ २॥ * सुन्दरकाण्ड * ९३ छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्रीरामजी भक्तोंक भयकों हरनेवाले वचन बोले-हे लंकेश ! परिवारसहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास बुरी जगहपर है॥ २॥ खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहड केहि भाँती॥ मैं जानजें तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥ ३॥ दिन-रात दुष्टोंकी मण्डलीमें बसते हो। [ऐसी दशामें] हे सखे ! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है ? मैं तुम्हारी सब रीति (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यन्त नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती ॥ ३॥ बरू भल बास नरक कर ताता। दुए संग जनि देह बिधाता॥ अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया।॥ ४॥ हे तात! नरकमें रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका संग [कभी] न दे। [विभीषणजीने कहा--] हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणोंका दर्शन कर कुशलसे हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझपर दया की है॥४॥ [दोहा ४६] तब लगि कुसल न जीव कहूँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥ ९४ * थ्रीरामचरितमानस * तबतक जीवकी कुशल नहीं और न स्वप्रमें भी उसके मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम (विषय- कामना)-को छोड़कर श्रीरामजीको नहीं भजता॥ ४६॥ तब लगि हृदयें बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥। जब लगि उर न बसत रखघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥ ५॥॥। लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभीतक हृदयमें बसते हैं, जबतक कि धनुष-बाण और कमरमें तरकस धारण किये हुए श्रीरघुनाथजी हृदयमें नहीं बसते॥ १॥ ममता तरुन तमी आँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥। तब लगि बसति जीव मन माहों। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ २॥ ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लओंको सुख देनेवाली है। वह (ममतारूपी रात्रि) तभीतक जीवके मनमें बसती है, जबतक प्रभु (आप) -का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता॥ २॥ अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देरिबर राम पद कमल तुम्हारे॥ तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥३॥ हे श्रीरामजी! आपके चरणारविन्दके दर्शन कर अब मैं कुशलसे हूँ, मेरे भारी भय मिट गये। हे कृपालु! आप जिसपर * सुन्दरकाण्ड * ९७ अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकारके भवशूल (आध्यात्मिक, आधिदेविक और आधिभौतिक ताप) नहीं व्यापते॥ ३॥ में निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥ जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदय मोहि लावा॥ ४॥ मैं अत्यन्त नीच स्वभावका राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियोंके भी ध्यानमें नहीं आता, उन प्रभुने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदयसे लगा लिया॥ ४॥ [दोहा ४७] अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। देखेउे नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥ हे कृपा और सुखके पुझ्न श्रीरामजी ! मेरा अत्यन्त असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिवजीके द्वारा सेवित युगल चरणकमलोंको अपने नेत्रोंसे देखा॥ ४७॥ सुनहु सखा निज कहडेँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥ जॉों नर होड चराचर दरोही। आयै सभय सरन तकि मोही॥ १॥ [ श्रीगयमजीने कहा-- ] हे सखा।! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती हैं। कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड-चेतन जगत््का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाय॥ १॥ ९६ * श्रीरामचरितमानस * तजि मद मोह कपट छल नाना। करडें सद्य तेहि साधु समाना॥ जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहद परिवारा॥ २॥ और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार--॥ २॥ सब के ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछ नाहोीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥ ३॥ इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है॥३॥ अस सज्जन मम उर बस केसें। लोभी हृदय बसइ धनु जेसें॥ तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरे देह नहिं आन निहोरें॥ ४॥ ऐसा सज्जन मेरे हृदयमें कैसे बसता है, जैसे लोभीके हृदयमें धन बसा करता है। तुम-सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और किसीके निहोरेसे (कृतज्ञतावश) देह धारण नहीं करता॥ ४॥ * सुन्दरकाण्ड * ९७ [दोहा ४८ ] सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ जो सगुण (साकार) भगवान्के उपासक हैं, दूसरेके हितमें लगे रहते हैं, नीति और नियमोंमें दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणोंके समान हैं ॥ ४८ ॥ सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥ राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥।२॥ हे लड्ढापति! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय हो। श्रीरामजीके वचन सुनकर सब वानरोंके समूह कहने लगे--कृपाके समूह श्रीरामजीकी जय हो!॥ १॥ सुनत बिभीषनु प्रभु के बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥ पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदय समात न ॒ प्रेमु अपारा॥ २॥ प्रभुकी वाणी सुनते हैं और उसे कानोंके लिये अमृत जानकर विभीषणजी अपघाते नहीं हैं। वे बार-बार श्रीरमजीके चरणकमलोंको पकड़ते हैं। अपार प्रेम है, हृदयमें समाता नहीं है॥ २॥ सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी ॥ ९८ * थ्रीरामचरितमानस * उर कछु प्रथम बासना रहोी। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ ३॥ [विभीषणजीने कहा-- ] हे देव! हे चराचर जगत्के स्वामी ! है शरणागतके रक्षक! हे सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले ! सुनिये, मेरे हृदयमें पहले कुछ वासना थी, वह प्रभुके चरणोंकी प्रीतिरूपी नदीमें बह गयी॥ ३॥ अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिर मन भावनी॥ एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥ ४॥ अब तो हे कृपालु ! शिवजीके मनको सदैव प्रिय लगनेवाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजीने तुरंत ही समुद्रका जल माँगा ॥ ४॥ जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोधघ जग माहीं॥ अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ ७५॥ [और कहा--] हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगतूमें मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नहीं जाता)। ऐसा कहकर श्रीरामजीने उनको राजतिलक कर दिया। आकाशसे पुष्पोंकी अपार वृष्टि हुई॥५॥ [दोहा ४९ (क)] रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेडउ दीन्हेड राजु अखंड॥ * सुन्दरकाण्ड * ९९ श्रीरमजीने रावणके क्रोधरूपी अग्रिमें, जो अपनी (विभीषणकी ) शधास (वचन) रूपी पवनसे प्रचण्ड हो रही थी, जलते हुए विभीषणको बचा लिया और उसे अखण्ड राज्य दिया॥ ४९ (क)॥ [दोहा ४९ (ख) ] जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥ शिवजीने जो सम्पत्ति रावणको दसों सिरोंकी बलि देनेपर दी थी, वही सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीने विभीषणको बहुत सकुचते हुए दी॥ ४९ (ख)॥ अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥ निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपषि कुल मन भावा॥ १॥ ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो मनुष्य दूसरेको भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु हैं। अपना सेवक जानकर विभीषणको श्रीरामजीने अपना लिया। प्रभुका स्वभाव वानरकुलके मनको [बहुत] भाया॥ १॥ पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥ बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥ २॥ फिर सब कुछ जाननेवाले, सबके हृदयमें बसनेवाले, सर्वरूप (सब रूपोंमें प्रकट), सबसे रहित, उदासीन, कारणसे (भक्तोंपर कृपा करनेके लिये) मनुष्य बने हुए तथा राक्षसोंके कुलका नाश १०० * श्रीरामचरितमानस * करनेवाले श्रीरामजी नीतिकी रक्षा करनेवाले वचन बोले-- ॥ २॥ सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥। संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥ ३॥ हे वीर वानरराज सुग्रीव और लड्ढापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्रको किस प्रकार पार किया जाय? अनेक जातिके मगर, साँप और मछलियोंसे भरा हुआ यह अत्यन्त अथाह समुद्र पार करनेमें सब प्रकारसे कठिन है॥३॥ कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥ जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिआ सागर सन जाई॥४॥ विभीषणजीने कहा-हे रघुनाथजी ! सुनिये, यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रोंकी सोखनेवाला है (सोख सकता है), तथापि नीति ऐसी कही गयी है (उचित यह होगा) कि [पहले] जाकर समुद्रसे प्रार्थाा की जाय॥४॥ [दोहा ५०] प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहे सकल भालु कपि धारि॥ हे प्रभु! समुद्र आपके कुलमें बड़े (पूर्वज) हैं, वे विचारकर उपाय बतला देंगे। तब रीछ और वानरोंकी सारी सेना बिना ही परिश्रमके समुद्रके पार उतर जायगी॥ ५०॥ * सुन्दरकाण्ड * १०१ सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ देव जौं होइ सहाई॥ मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥ १॥। [ श्रीरामजीने कहा-- ] हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया। यही किया जाय, यदि देव सहायक हों। यह सलाह लक्ष्मणजीके मनको अच्छी नहीं लगी। श्रीरामजीके वचन सुनकर तो उन्होंने बहुत ही दुःख पाया॥ १॥ नाथ देव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥ कादर मन कहूँ एक अधारा। देव देव आलसी पुकारा॥ २॥ [लक्ष्मणजीने कहा--] हे नाथ! दैवका कौन भरोसा! मनमें क्रोध कीजिये (ले आइये) और समुद्रको सुखा डालिये। यह दैव तो कायरके मनका एक आधार (तसल्ली देनेका उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं॥२॥ सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं. करब धरहु मन धीरा॥ अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु. समीप गए रघुराई॥ ३॥ यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले--ऐसे ही करेंगे, मनमें धीरज रखो । ऐसा कहकर छोटे भाईको समझाकर प्रभु श्रीरघुनाथजी समुद्रके समीप गये॥ ३॥ १०२ * थ्रीरामचरितमानस * प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरू नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥ जबहिं बिभीषन प्रभु पहि।. आए। पाछें रावन दूत पटाए॥ ४ ॥। उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया। फिर किनारेपर कुश बिछाकर बैठ गये। इधर ज्यों ही विभीषणजी प्रभुके पास आये थे, त्यों ही रावणने उनके पीछे दूत भेजे थे॥४॥ [दोहा ५१] सकल चरित तिन््ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन॒ हृदय सराहहिं सरनागत पर नेह॥ कपटसे वानरका शरीर धारणकर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं। वे अपने हृदयमें प्रभुके गुणोंकी और शरणागतपर उनके स्नेहकी सराहना करने लगे॥ ५१॥ प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥ रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥ १॥ फिर वे प्रकटरूपमें भी अत्यन्त प्रेमके साथ श्रीरामजीके स्वभावकी बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेष) भूल गया! तब वानरोंने जाना कि ये शत्रुके दूत हैं और वे उन सबको बाँधकर सुग्रीवके पास ले आये॥१॥ कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥ * सुन्दरकाण्ड * १०३ सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥ २॥ सुग्रीवने कहा--सब वानरो! सुनो, राक्षसोंके अज्भ-भज़ करके भेज दो। सुग्रीवके वचन सुनकर वानर दौड़े। दूतोंको बाँधकर उन्होंने सेनाके चारों ओर घुमाया॥ २॥ बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न॒ त्यागे॥ जो हमार हर नासा काना। तेहि. कोसलाधीस के आना॥ ३॥ वानर उन्हें बहुत तरहसे मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरोंने उन्हें नहीं छोड़ा। [तब दूतोंने पुकारकर कहा--] जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीरमजीकी सौगंध है॥३॥ सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसिे तुरत छोड़ाए॥ रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥ ४॥ यह सुनकर लक्ष्मणजीने सबको निकट बुलाया। उन्हें बड़ी दया लगी, इससे हँसकर उन्होंने राक्षसोंकों तुरंत ही छुड़ा दिया। [और उनसे कहा--] रावणके हाथमें यह चिट्ठी देना [और कहना--] हे कुलघातक! लक्ष्मणके शब्दों (सँदेसे )-को बाँचो ॥ ४॥ [दोहा ५२] कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। सीता देह मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥ १०४ * श्रीरामचरितमानस * फिर उस मूर्खसे जबानी यह मेरा उदार (कृपासे भरा हुआ) सन्देश कहना कि सीताजीको देकर उनसे (श्रीरामजीसे ) मिलो, नहीं तो तुम्हागा काल आ गया [समझो] ॥ ५२॥ तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥ कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिनन््ह नाए॥१॥ लक्ष्मणजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर, श्रीरामजीके गुणोंकी कथा वर्णन करते हुए दूत तुरंत ही चल दिये। श्रीरामजीका यश कहते हुए वे लड्ढामें आये और उन्होंने रावणके चरणोंमें सिर नवाये॥ १॥ बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥ पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि. मृत्यु आई अति नेरी॥२॥ दशमुख रावणने हँसकर बात पूछी--अरे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं कहता ? फिर उस विभीषणका समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यन्त निकट आ गयी है॥२॥ करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि. जब कर कीट अभागी॥। पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥ ३॥ * सुन्दरकाण्ड * श्०ण मूर्खने राज्य करते हुए लड्ढ्को त्याग दिया। अभागा अब जौका कीड़ा (घुन) बनेगा (जौके साथ जैसे घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नर-वानरोंके साथ वह भी मारा जायगा); फिर भालु और वानरोंकी सेनाका हाल कह, जो कठिन कालकी प्रेरणासे यहाँ चली आयी है॥३॥ जिन्न्ह के जीवन कर रखबवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥। कह तपसिन्न्ह के बात बहोरी। जिनह के हृदयेँ त्रास अति मोरी॥ ४॥ और जिनके जीवनका रक्षक कोमल चित्तवाला बेचारा समुद्र बन गया है (अर्थात् उनके और राक्षसोंके बीचमें यदि समुद्र न होता तो अबतक राक्षस उन्हें मारकर खा गये होते)। फिर उन तपस्वियोंकी बात बता, जिनके हृदयमें मेरा बड़ा डर है॥४॥ [दोहा ५३] की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥ उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानोंसे मेरा सुयश सुनकर ही लौट गये ? शत्रुसेनाका तेज और बल बताता क्यों नहीं ? तेरा चित्त बहुत ही चकित (भौंचक्का-सा) हो रहा है॥ ५३॥ नाथ कृपा करि पूँछेह जेैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तेैसें॥ मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥ १॥ ५१०६ * श्रीरामचरितमानस * [दूतने कहा--] हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिये (मेरी बातपर विश्वास कीजिये) । जब आपका छोटा भाई श्रीरामजीसे जाकर मिला, तब उसके पहुँचते ही श्रीरामजीने उसको राजतिलक कर दिया॥ १॥ रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥ श्रवन नासिका कार्टे॑ लागे। राम सपथ दीनन्हें हम त्यागे॥२॥ हम रावणके दूत हैं, यह कानोंसे सुनकर वानरोंने हमें बाँधकर बहुत कष्ट दिये, यहाँतक कि वे हमारे कान-नाक काटने लगे। श्रीरमजीकी शपथ दिलानेपर कहीं उन्होंने हमको छोड़ा॥ २॥ पूँछिहु. नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥ नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥ ३॥। हे नाथ! आपने श्रीरामजीकी सेना पूछी; सो वह तो सौ करोड़ मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। अनेकों रंगोंके भालु और वानरोंकी सेना है, जो भयंकर मुखवाले, विशाल शरीरवाले और भयानक हैं॥३॥ जेहिं पुर दहेउ हतेड सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥ अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥ ४॥। जिसने नगरको जलाया और आपके पुत्र अक्षयकुमारको * सुन्दरकाण्ड * ५१०७ मारा, उसका बल तो सब वानरोंमें थोड़ा है। असंख्य नामोंवाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं। उनमें असंख्य हाथियोंका बल है और वे बड़े ही विशाल हैं॥ ४॥ [दोहा ५४] द्वेबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। दध्िमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥ द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवानू-ये सभी बलकी राशि हैं॥ ५४॥ ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥ राम कृपाँ अतुलित बल तिन््हहीं। तन समान अजैलोकहि गनहीं॥ १॥ ये सब वानर बलमें सुग्रीवके समान हैं और इनके-जैसे [एक-दो नहीं] करोड़ों हैं, उन बहुत-सोंको गिन ही कौन सकता है? श्रीरामजीकी कृपासे उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकोंको तृणके समान [तुच्छ] समझते हैं॥१॥ अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥ नाथ कटक महूँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीते रन माहीं॥ २॥ हे दशग्रीव! मैंने कानोंसे ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरोंके सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेनामें ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रणमें न जीत सके॥ २॥ १०८ * थ्रीरामचरितमानस * परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥ सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न॒ त भरि कुधर बिसाला॥ ३॥ सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे हाथ मीजते हैं। पर श्रीरघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपोंसहित समुद्रको सोख लेंगे। नहीं तो बड़े-बड़े पर्वतोंसे उसे भरकर पूर (पाट) देंगे॥ ३॥ मर्दि_गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेडह बचन कहहिं सब कीसा॥ गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहूँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥४॥ और रावणको मसलकर धूलमें मिला देंगे। सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लड्डाको निगल ही जाना चाहते हैं॥ ४॥ [दोहा ५५] सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहूँ जीति सकहिं संग्राम ॥ सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिरपर प्रभु (सर्वेश्वर) श्रीरामजी हैं। हे रावण! वे संग्राममें करोड़ों कालोंको जीत सकते हैं॥ ५५॥ राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥ * सुन्दरकाण्ड * १०९ सक सर एक सोधि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेडठ. नय नागर॥ १॥ श्रीरामचन्द्रजीके तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धिकी अधिकताको लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाणसे सैकड़ों समुद्रोंको सोख सकते हैं, परन्तु नीतिनिपुण श्रीरामजीने [नीतिकी रक्षाके लिये] आपके भाईसे उपाय पूछा॥ १॥ तासु बचन सुनि सागर पाहोीं। सागत पंथ कृपा मन माहीं॥ सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥ २॥। उनके (आपके भाईके) वचन सुनकर वे ( श्रीरामजी ) समुद्रसे राह माँग रहे हैं, उनके मनमें कृपा भरी है [इसलिये वे उसे सोखते नहीं] | दूतके ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा [ और बोला--] जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरोंको सहायक बनाया है॥ २॥ सहज भीरू कर बचन टदृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥ मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥३॥ स्वाभाविक ही डरपोक विभीषणके वचनको प्रमाण करके उन्होंने समुद्रसे मचलना (बालहठ) ठाना है। अरे मूर्ख ! झूठी बड़ाई क्या करता है! बस, मैंने शत्रु (राम)-के बल और बुद्धिकी थाह पा ली॥३॥ सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥ ११५० * श्रीरामचरितमानस * सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥ ४॥ जिसके विभीषण-जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगत्में विजय और विभूति (ऐश्वर्य) कहाँ ? दुष्ट रावणके वचन सुनकर दूतको क्रोध बढ़ आया। उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली ॥ ४॥ रामानुज दीन्ल्ही यह पाती। नाथ बचाई जुड़ावहु छाती॥ बिहसि बाम कर लीनही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥ ५ ॥ [ और कहा--] श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिये। रावणने हँसकर उसे बायें हाथसे लिया और मन्त्रीको बुलवाकर वह मूर्ख उसे बँचाने लगा॥५॥ [दोहा ५६ (क) ] बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ [पत्रिकामें लिखा था--] अरे मूर्ख! केवल बातोंसे ही मनको रिझाकर अपने कुलको नष्ट-भ्रष्ट न कर! श्रीरामजीसे विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेशकी शरण जानेपर भी नहीं बचेगा॥ ५६ (क)॥ [दोहा ५६ (ख) ] की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥ या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषणकी भाँति * सुन्दरकाण्ड * १११ प्रभुके चरण-कमलोंका भ्रमर बन जा। अथवा रे दुष्ट ! श्रीरामजीके बाणरूपी अग्निमें परिवारसहित पतिंगा हो जा (दोनोंमेंसे जो अच्छा लगे सो कर) ॥ ५६ (ख)॥ सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥ भूमि परा कर गहत अकासा। लघ्चु तापस कर बाग बिलासा॥ १॥ पत्रिका सुनते ही रावण मनमें भयभीत हो गया, परन्तु मुखसे (ऊपरसे ) मुसकराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा-- जैसे कोई पृथ्वीपर पड़ा हुआ हाथसे आकाशको पकड़नेकी चेष्टा करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करता है (डींग हाँकता है) ॥ १॥ कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥ सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥ २॥ शुक (दूत)-ने कहा--हे नाथ! अभिमानी स्वभावको छोड़कर [इस पत्रमें लिखी] सब बातोंको सत्य समझिये। क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिये। हे नाथ! श्रीरामजीसे बैर त्याग दीजिये॥ २॥ अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥ मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउठ थधरिही॥ ३॥ ५११२ * श्रीरामचरितमानस * यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकोंके स्वामी हैं, पर उनका स्वभाव अत्यन्त ही कोमल है। मिलते ही प्रभु आपपर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदयमें नहीं रखेंगे॥ ३ ॥ जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥ जब तेहिं कहा देन बेदेही। चअरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥ ४॥ जानकीजी श्रीरघुनाथजीको दे दीजिये। हे प्रभु! इतना कहना मेरा कीजिये। जब उस (दूत)-ने जानकीजीको देनेके लिये कहा, तब दुष्ट रावणने उसको लात मारी ॥ ४॥ नाइ चरन सिरे चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥ करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥५॥ वह भी [विभीषणकी भाँति] चरणोंमें सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनायी और श्रीरामजीकी कृपासे अपनी गति (मुनिका स्वरूप) पायी॥५॥ रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउठ रहा मुनि ग्यानी॥ बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहूँ पगु धारा॥६॥ * सुन्दरकाण्ड * ११३ (शिवजी कहते हैं--) हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषिके शापसे राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रमको चला गया॥ ६॥ [दोहा ५७] बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ इधर तीन दिन बीत गये, किन्तु जड समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्रीरामजी क्रोधसहित बोले--बिना भयके प्रीति नहीं होती |! ॥ ५७॥ लछिमन बान सरासन आजनू। सोषों बारिधि बिसिख कूसानू॥ सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥ १५॥ हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाणसे समुद्रको सोख डालूँ। मूर्खसे विनय, कुटिलके साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूससे सुन्दर नीति (उदारताका उपदेश),॥ १॥ ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥ क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥२॥ ममतामें फँसे हुए मनुष्यसे ज्ञानकी कथा, अत्यन्त लोभीसे ११४ * श्रीरामचरितमानस * वैराग्यका वर्णन, क्रोधीसे शम (शान्ति)-की बात और कामीसे भगवान्की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसरमें बीज बोनेसे होता है (अर्थात् ऊसरमें बीज बोनेकी भाँति यह सब व्यर्थ जाता है) ॥ २॥ अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछ्िमन के मन भावा॥ संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदध्ि उर अंतर ज्वाला॥ ३॥ ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजीके मनको बहुत अच्छा लगा। प्रभुने भयानक [अग्नि] बाण सन्धान किया, जिससे समुद्रके हृदयके अंदर अग्रिको ज्वाला उठी॥ ३॥ सकर उरग झष गन अकुलाने | जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥ कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ ततजि माना॥ ४॥ मगर, साँप तथा मछलियोंके समूह व्याकुल हो गये। जब समुद्रने जीवोंको जलते जाना, तब सोनेके थालमें अनेक मणियों (रत्रों )को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मणके रूपमें आया॥ ४॥ [दोहा ५८] काटेहिं पह कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पड नव नीच॥ [काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी! सुनिये, चाहे * सुन्दरकाण्ड * १५७५ कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटनेपर ही फलता है। नीच विनयसे नहीं मानता, वह डाटनेपर ही झुकता है (रास्तेपर आता है) ॥५८॥ सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु. नाथ सब अवगुन मेरे॥ गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कड़ नाथ सहज जड़ करनी॥ १॥ समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़कर कहा--हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी--इन सबकी करनी स्वभावसे ही जड है॥ १॥ तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥ प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥२॥ आपकी प्रेरणासे मायाने इन्हें सृष्टिके लिये उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थोंने यही गाया है। जिसके लिये स्वामीकी जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकारसे रहनेमें सुख पाता है॥ २॥ प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्ही कीन्ही॥ ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥ ३॥ प्रभुने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दण्ड) दी; किन्तु मर्यादा (जीवोंका स्वभाव) भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल, गँवार, ११६ * श्रीरामचरितमानस * शूद्र, पशु और स्त्री--ये सब शिक्षाके अधिकारी हैं॥ ३॥ प्रभु॒ प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिष्ठि कटकु न मोरि बड़ाई॥ प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करोौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥ ४॥ प्रभुके प्रतापसे मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि प्रभुकी आज्ञा अपेल है (अर्थात् आपकी आज्ञाका उल्लड्वडन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ॥ ४॥ [दोहा ५९] सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरे कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥ समुद्रके अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामजीने मुसकराकर कहा-हे तात! जिस प्रकार वानरोंकी सेना पार उतर जाय, वह उपाय बताओ ॥ ५९॥ नाथ नील नल कपि दट्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई॥ तिन््ह के परस किए गिरि भारे। तरिहहि,०ं, जलधि प्रताप तुम्हारे॥ १॥ [समुद्रने कहा--] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपनमें ऋषिसे आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैर जायँगे॥ १॥ * सुन्दरकाण्ड * ५१५७ में पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करेहें बल अनुमान सहाई॥ एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइआ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइआअ॥ २॥ मैं भी प्रभुकी प्रभुताकों हृदयमें धारण कर अपने बलके अनुसार (जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ ! इस प्रकार समुद्रको बँधाइये, जिससे तीनों लोकोंमें आपका सुन्दर यश गाया जाय॥ २॥ एहिं सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥ सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं,. हरी राम रनथधीरा॥ ३॥ इस बाणसे मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके राशि दुष्ट मनुष्योंका वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजीने समुद्रके मनकी पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाणसे उन दुष्टोंका वध कर दिया) ॥ ३॥ देरिब॒ राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउठ सुखारी॥ सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥ ४॥ श्रीरामजीका भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह सुनाया। फिर चरणोंकी वन्दना करके समुद्र चला गया॥ ४॥ ११८ * श्रीरामचरितमानस * [छन््द] निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥ समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत (उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुगके पापोंको हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है। श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले और विषादका दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसारका सब आशा-भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन। [दोहा ६०] सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मद्गलोंका देनेवाला है। जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन)-के ही भवसागरको तर जायाँगे॥६०॥ मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्ञमः सोपान: समाप्त:। कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ। (सुन्दरकाण्ड समाष) ॥ श्रीहनूमते नमः ॥
Singer : Sunil Dutt Chaturvedi
Music : Vikas Dutt Chaturvedi
Lyrics : Manglesh Dutt Chaturvedi
Produced By : Bhakti Ras Pravah
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Lyrics : Manglesh Dutt Chaturvedi
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ये हनुमान जी के अच्छे वाले भजन भी सुनें :
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Bhakti Ras Pravah-भक्ति रस प्रवाह
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