सत्यनारायण व्रत की संपूर्ण कथा – सभी अध्याय एक स्थान पर

 सम्पूर्ण श्री सत्यनारायण व्रत कथा – पूर्ण विवरण एवं अध्यायवार कथा

सत्यनारायण भगवान की कथा का धार्मिक चित्र
सत्यनारायण व्रत की संपूर्ण कथा


🌼 श्री सत्यनारायण व्रत कथा (प्रथम अध्याय )

एक बार की बात है, पुण्यभूमि नैषारण्य तीर्थ में जब अनेक महर्षि—शौनक और उनके साथ उपस्थित 88,000 ऋषि—यज्ञ कर रहे थे, तब उन्होंने श्री सूतजी से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा।

उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा:
"हे सूतजी! कृपा करके हमें यह बताइए कि इस कलियुग में, जहाँ मनुष्य वेद-विद्या से वंचित होते जा रहे हैं, वहां प्रभु की भक्ति कैसे संभव है? कौन-सा ऐसा तप या उपाय है जिससे थोड़े से प्रयास में मनुष्य पुण्य अर्जित कर ले और अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति पा ले? कृपया हमें कोई ऐसा सरल, किंतु प्रभावी व्रत बताइए जिससे मनवांछित फल भी प्राप्त हो और आत्मा का कल्याण भी हो।"

यह सुनकर सर्वज्ञ, धर्मतत्त्व के ज्ञाता सूतजी बोले:
"हे ऋषियों! आपने अत्यंत लोकहितकारी प्रश्न किया है। अब मैं आपको एक ऐसा व्रत बताने जा रहा हूँ जो स्वयं देवर्षि नारद ने भगवान लक्ष्मीनारायण से पूछा था। यह व्रत सभी युगों में पुण्य देने वाला, विशेष रूप से कलियुग में मोक्ष का सरल मार्ग है।"

सूतजी कथा में आगे कहते हैं:

देवर्षि नारद, जो सदा लोककल्याण की भावना लिए लोकों में भ्रमण करते हैं, एक बार पृथ्वी पर आए। उन्होंने देखा कि यहाँ के प्राणी अनेक योनियों में जन्म लेकर अपने ही कर्मों से दुखी हैं — कोई रोगी है, कोई दरिद्र, तो कोई दुखों से घिरा हुआ।

नारद जी का मन द्रवित हुआ। वे विचार करने लगे, "ऐसा क्या किया जाए जिससे इन दुखी प्राणियों को शीघ्र ही कष्टों से मुक्ति मिले?" यही सोचकर वे विष्णुलोक पहुंचे और भगवान नारायण के चरणों में नतमस्तक होकर स्तुति करने लगे।

नारद बोले:
"हे प्रभु! आप सर्वशक्तिमान, निर्गुण और सृष्टि के आधार हैं। आपकी महिमा अपरंपार है — मन और वाणी से भी परे। आप ही भक्तों के कष्टों को हरते हैं। हे नाथ! मेरी विनती है कि मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे पृथ्वी के प्राणी सरलता से अपने दुखों से छुटकारा पा सकें।"

भगवान विष्णु ने मुस्कराते हुए कहा:
"हे नारद! तुमने जो पूछा है वह अत्यंत करुणा से पूर्ण है। मैं तुम्हें एक ऐसा व्रत बताता हूँ जो मनुष्य को मोह से मुक्त करता है, पुण्य देता है और अंत में मोक्ष प्रदान करता है। इस व्रत का नाम है — श्री सत्यनारायण व्रत।"

"जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत को करता है, वह न केवल इस जीवन में सुख भोगता है, बल्कि मृत्यु के बाद भी दिव्य गति को प्राप्त करता है।"

यह सुनकर नारद मुनि बोले:
"हे प्रभु! कृपया विस्तार से बताइए कि यह व्रत कब और कैसे करना चाहिए? इसमें कौन-कौन सी सामग्री चाहिए और इसका फल क्या होता है?"

भगवान विष्णु ने कहा:
"हे मुनि! यह व्रत शुभ मुहूर्त में, विशेषकर पूर्णिमा के दिन, सायंकाल के समय करना उत्तम होता है। घर को पवित्र करके भगवान सत्यनारायण का चित्र स्थापित करें। केले के फल, गेहूँ या साठी का आटा, घी, दूध, शक्कर, गुड़ और पंचामृत से भोग तैयार करें। ब्राह्मणों और बंधु-बांधवों को आमंत्रित कर विधिवत कथा सुनें और भजन-कीर्तन करें। फिर सभी को भोजन कराकर स्वयं भोजन करें।"

"इस व्रत को श्रद्धा से करने वाला व्यक्ति जीवन के सभी सुखों को प्राप्त करता है और अंत में मोक्ष पाता है।"


🔱 इस प्रकार श्री सत्यनारायण व्रत की कथा का प्रथम अध्याय पूर्ण होता है।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
श्रीमन्न नारायण नारायण नारायण।
भज मन नारायण नारायण नारायण।

🌼 श्री सत्यनारायण व्रत कथा (द्वितीय अध्याय )

सूतजी ने कहा – हे ऋषियों! अब मैं आपको उस व्रत का इतिहास बताता हूँ जो किसी समय एक निर्धन ब्राह्मण ने किया था। ध्यानपूर्वक सुनिए।

काशीपुरी नामक पावन नगर में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण रहता था। वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर दिन-रात भिक्षा मांगते हुए इधर-उधर भटकता था। एक दिन भगवान ने स्वयं ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके पास जाकर पूछा –
"हे विप्र! तुम हर समय दुखी क्यों रहते हो? क्या तुम्हें कोई सहायता चाहिए?"

दीन-हीन ब्राह्मण ने कहा –
"मैं अत्यंत निर्धन हूँ। भिक्षा के लिए भटक रहा हूँ। हे प्रभु! यदि आप मेरे लिए कोई उपाय बताएं तो मैं उसकी कृपा मानूँगा।"

भगवान ने उसे प्रोत्साहित करते हुए कहा –
"हे ब्राह्मण! सत्यनारायण भगवान का व्रत करो, यह व्रत मनोकामनाएं पूरी करता है और सभी दुःखों से मुक्ति दिलाता है।"

यह कहकर भगवान वृद्ध ब्राह्मण के रूप में वहां से गायब हो गए।

ब्राह्मण ने मन ही मन ठाना कि वह यह व्रत अवश्य करेगा। उस रात उसे नींद न आई, वह सुबह जल्दी उठकर भिक्षा मांगने निकल पड़ा। उसी दिन उसे अनायास ही अच्छी-खासी भिक्षा मिली।

उस धन से उसने अपने परिवार और मित्रों को एकत्रित कर, विधिपूर्वक श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन और व्रत किया।

व्रत पूरा करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी कष्टों से मुक्त हो गया और उसे अपार धन-सम्पदा प्राप्त हुई। तत्पश्चात वह प्रतिमाह इस व्रत को करता रहा।

ऐसे सत्यनारायण व्रत को करने वाला मनुष्य पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है और जीवन में सुख-शांति पाता है।

सूतजी बोले –
"हे मुनियों! नारद जी से भगवान नारायण द्वारा कहा गया यह व्रत मैंने आपको बताया। अब मुझे और क्या कहने की आवश्यकता है?"

ऋषियों ने कहा –
"हे सूतजी! हमें यह जानना है कि इस व्रत को करने वाले और कौन-कौन हैं। हम सुनना चाहते हैं, क्योंकि हममें इस व्रत के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई है।"

सूतजी बोले –
"हे मुनियों! जिन-जिस ने इस व्रत का पालन किया, उसकी भी कथा सुनो।"

तब सूतजी ने आगे बताया –

वह निर्धन ब्राह्मण अब संपन्न हो चुका था और अपने परिवार एवं सगे संबंधियों के साथ पुनः व्रत करने की तैयारी में था।

तभी एक वृद्ध लकड़हारा पास आया। उसने लकड़ियाँ बाहर रखीं और अंदर जाकर ब्राह्मण को नमस्कार किया। वह पूछने लगा –
"यह क्या कर रहे हो? यह व्रत कैसे करना चाहिए? इसका फल क्या होता है?"

ब्राह्मण ने उत्तर दिया –
"यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है, जो सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। इस व्रत की कृपा से मेरे जीवन में समृद्धि आई है।"

लकड़हारा यह सुनकर हर्षित हुआ। उसने चरणामृत लेकर प्रसाद खाया और मन में ठाना कि वह भी शीघ्र ही यह व्रत करेगा।

अपने लकड़ी बेचने के लिए वह नगर गया, जहाँ अधिक धनवान लोग रहते थे। वहाँ उसे अपनी लकड़ियों का मूल्य चार गुना अधिक मिला।

उस धन से वह सत्यनारायण व्रत के लिए आवश्यक वस्तुएं जैसे केले, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूं का आटा लेकर घर लौटा।

अपने परिजनों एवं बंधु-बांधवों को बुलाकर विधिपूर्वक पूजा की।

इस व्रत के फलस्वरूप वह लकड़हारा भी धन-सम्पदा और संतान की प्राप्ति से युक्त हो गया और अंततः मोक्ष को प्राप्त हुआ।


॥ इस प्रकार श्री सत्यनारायण व्रत कथा का द्वितीय अध्याय पूर्ण होता है।

श्रीमन्न नारायण नारायण नारायण।
भज मन नारायण नारायण नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय॥

🌼 श्री सत्यनारायण व्रत कथा (तृतीय अध्याय )

सूतजी ने कहा: हे ज्ञानी मुनियों, अब मैं अगली कथा कहूँगा। प्राचीन समय में उल्कामुख नामक एक ज्ञानी और सत्यवादी राजा था। वह अपने इन्द्रिय पर संयम रखता था और प्रतिदिन देव स्थानों में जाकर निर्धनों की सहायता करता था। उसकी पत्नी बहुत सुंदर और धर्मपरायण थी। वे दोनों भद्रशीला नदी के किनारे श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करते थे।

एक दिन एक वैश्य साधु, जो व्यापार में समृद्ध था, उस राजा को व्रत करते देखकर उत्सुक हुआ और आदरपूर्वक पूछा, “हे राजन, आप यह क्या कर रहे हैं? कृपया मुझे भी इस व्रत के बारे में बताइए।” राजा ने बताया कि वे अपने परिवार के कल्याण और संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत कर रहे हैं।

साधु ने राजा से पूरी विधि पूछी और कहा कि वह भी इस व्रत को करेगा क्योंकि उसकी भी संतान नहीं थी। वह अपने घर वापस गया और पत्नी लीलावती को इस व्रत के बारे में बताया। कुछ समय बाद लीलावती गर्भवती हुई और उन्होंने अपनी पुत्री का नाम कलावती रखा।

जब कलावती बड़ी हुई, लीलावती ने साधु को याद दिलाया कि व्रत करने का समय आ गया है। साधु ने कहा कि वह बेटी के विवाह के बाद यह व्रत करेगा। कलावती का विवाह उचित वर के साथ संपन्न हुआ, लेकिन साधु ने अभी तक व्रत नहीं किया।

भगवान सत्यनारायण इस बात से क्रोधित हुए और साधु पर श्राप दिया। साधु और उसका जमाई व्यापार के लिए रत्नासारपुर नगर गए। एक चोर राजा का धन चुराकर भाग रहा था और उस धन को वहीं छोड़ गया जहाँ साधु ठहरा था। सिपाहियों ने धन पाया और साधु तथा उसके जमाई को चोर समझकर जेल में डाल दिया।

साधु की पत्नी लीलावती बहुत दुखी हुई। उनके घर का धन भी चोरी हो गया। भूख और दुख से परेशान कलावती एक ब्राह्मण के घर गई, जहाँ उसने सत्यनारायण व्रत देखा और कथा सुनी। वह प्रसन्न होकर घर लौटी।

कलावती ने अपनी माँ से कहा कि उसने सत्यनारायण भगवान का व्रत देखा है। लीलावती ने अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ मिलकर भगवान की पूजा की और प्रार्थना की कि साधु और जमाई शीघ्र स्वस्थ होकर वापस आएँ।

भगवान सत्यनारायण प्रसन्न होकर राजा चन्द्रकेतु को एक स्वप्न में दर्शन दिए और आदेश दिया कि साधु और जमाई को जेल से रिहा करें तथा उनका धन लौटाएं। राजा ने यह किया और दोनों वैश्य सम्मानित होकर घर लौटे।

इस प्रकार सत्यनारायण भगवान के व्रत से सभी दुख दूर हुए और परिवार में सुख-शांति बनी।


श्रीमन्न नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय।

🌼 श्री सत्यनारायण व्रत कथा (चतुर्थ  अध्याय )

सूतजी बोले: वैश्य साधु ने मंगलाचार कर अपनी यात्रा प्रारंभ की और अपने नगर की ओर बढ़ने लगा। थोड़ी दूर जाने पर एक दण्डी वेशधारी, जो स्वयं श्री सत्यनारायण भगवान थे, उससे मिले और पूछा, “हे साधु, तेरी नाव में क्या रखा है?”

वैश्य हँसकर बोला, “हे दण्डी, आप क्यों पूछते हो? क्या आप धन लेने की इच्छा रखते हो? मेरी नाव में केवल बेल के पत्ते और शाखाएं हैं।”

भगवान ने कहा, “तुम्हारा यह वचन सच हो।” फिर वह दण्डी वहाँ से दूर हो गए। कुछ दूरी पर जाकर वह समुद्र के किनारे बैठ गए।

दण्डी के चले जाने के बाद, साधु ने नाव में बेल-पत्ते देखकर आश्चर्यचकित होकर नित्यकर्म पूरा किया। तभी वह नाव अचानक उठने लगी, और साधु मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ा।

जब उसकी चेतना वापस आई, तो वह बड़े दुख में डूबा हुआ था। उसका दामाद बोला, “आप शोक मत करें, यह दण्डी का श्राप है। हमें उनकी शरण में जाना चाहिए तभी हमारी मनोकामनाएँ पूरी होंगी।”

साधु ने दामाद की बात मानकर भगवान के पास जाकर विनम्रतापूर्वक कहा, “हे भगवान! मैंने जो असत्य कहा उसके लिए क्षमा करें। मैं अब पूरी निष्ठा से आपकी पूजा करूँगा। कृपा करके मेरी रक्षा करें और मेरी नाव को धन से भर दें।”

भगवान प्रसन्न हुए और साधु की बात मानकर उसे वरदान दिया। फिर वे अदृश्य हो गए।

जब साधु और उसका दामाद नाव पर लौटे तो वह धन-धान्य से भरी थी। उन्होंने अपने साथियों के साथ विधिपूर्वक श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और अपने नगर की ओर चल दिए।

नगर के पास पहुंचकर, उन्होंने एक दूत को साधु की पत्नी को सूचित करने के लिए भेजा। दूत ने प्रणाम करते हुए कहा, “स्वामी और उनका दामाद नगर के नजदीक आ गए हैं।”

यह सुनकर साधु की पत्नी लीलावती ने हर्षित होकर भगवान की पूजा की और अपनी पुत्री कलावती से कहा, “मैं अपने पति के दर्शन को जा रही हूँ, तुम यहाँ रहकर काम पूरा करो और जल्दी आ जाना।”

कलावती ने प्रसाद छोड़कर तुरंत अपने पिता के पास जाने की जल्दी की। प्रसाद की अवज्ञा से भगवान क्रोधित हो गए, और नाव सहित साधु को पानी में डुबो दिया।

कलावती जब अपने पति को नहीं पाई तो वह आंसुओं से भरी जमीन पर गिर गई।

साधु दुःखी होकर बोला, “हे प्रभु! मेरी गलती और परिवार की भूल को क्षमा करें।”

यह सुनकर भगवान प्रसन्न हुए और आकाशवाणी हुई: “हे साधु! तेरी कन्या ने प्रसाद छोड़ा है, इसलिए उसका पति अदृश्य हो गया है। वह जब प्रसाद ग्रहण कर लौटेगी, तब उसका पति भी उसके साथ मिलेगा।”

कलावती घर जाकर प्रसाद ग्रहण कर वापस आई और अपने पति को पाया।

फिर साधु ने अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ विधि-विधान से सत्यनारायण भगवान का पूजन किया।

इस व्रत के प्रभाव से वह संसार में सुख-शांति से रहा और अंततः स्वर्ग को प्राप्त हुआ।


॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चतुर्थ अध्याय समापन ॥

श्रीमन्न नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय॥

🌼 श्री सत्यनारायण व्रत कथा (पंचम अध्याय )

सूतजी बोले: हे ऋषियों! अब मैं एक और कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। प्रजापालन में लगे हुए एक राजा थे, जिनका नाम तुंगध्वज था। एक बार वे भगवान का प्रसाद त्याग कर बहुत दुख झेलने लगे।

एक दिन वे वन में गए और वन्य जीवों को मारकर एक बड़े पेड़ के नीचे आए। वहाँ उन्होंने अपने बंधुओं सहित ग्वालों को भक्ति-भाव से सत्यनारायण भगवान की पूजा करते देखा। परन्तु अभिमान में डूबा राजा पूजा स्थल तक भी नहीं गया और भगवान को प्रणाम भी नहीं किया।

ग्वालों ने उन्हें प्रसाद दिया, लेकिन राजा ने उसे स्वीकार नहीं किया और प्रसाद वहीं छोड़कर अपने नगर वापस चला गया।

जब वह नगर पहुँचा तो सब कुछ तहस-नहस हो चुका था। यह देखकर उसे समझ आ गया कि यह सब भगवान की ही लीला है। वह पुनः ग्वालों के पास गया, विधि-पूर्वक पूजा की और प्रसाद ग्रहण किया।

भगवान सत्यनारायण की कृपा से सब कुछ पहले जैसा पुनः स्थापित हो गया।

लंबे समय तक सुख-समृद्धि का अनुभव करने के बाद, राजा का स्वर्गलोक में निवास हुआ।

सूतजी बोले: जो मनुष्य यह अत्यंत दुर्लभ व्रत करता है, उसे भगवान सत्यनारायण की अनुकंपा से धन-धान्य की प्राप्ति होती है। निर्धन धनवान बन जाता है, भय से मुक्त होकर सुखपूर्वक जीवन बिताता है। संतानहीन को संतान सुख मिलता है और सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। अंततः वह मोक्ष पाकर वैकुंठ धाम को जाता है।

सूतजी ने आगे कहा: जिन्होंने इस व्रत को किया, उनके पुनर्जन्म की भी कथा है। वृद्ध शतानंद ब्राह्मण सुदामा बनकर मोक्ष को प्राप्त हुए। लकड़हारा निषाद बनकर मुक्त हो गया। उल्कामुख राजा दशरथ होकर स्वर्ग गए। साधु वैश्य मोरध्वज बनकर अपने पुत्र की रक्षा करते हुए मोक्ष को प्राप्त हुए। महाराज तुंगध्वज स्वयंभू होकर भगवान के भक्त बन मोक्ष पाकर चले गए।


॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पंचम अध्याय संपूर्ण ॥

श्रीमन्न नारायण-नारायण-नारायण।
भज मन नारायण-नारायण-नारायण।
श्री सत्यनारायण भगवान की जय॥


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