शीतला अष्टमी 2026: महत्व, कथा, पूजा विधि, और स्वास्थ्य से जुड़ी मान्यताएं
शीतला अष्टमी का महत्व – माता शीतला की कृपा से रोगों से रक्षा और जीवन में शीतलता
भारत की सनातन संस्कृति में पर्व केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवनशैली, स्वास्थ्य, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक समरसता का सुंदर संगम भी हैं। इन्हीं पावन पर्वों में से एक है शीतला अष्टमी, जिसे विशेष रूप से माता शीतला की पूजा, शीतल भोजन की परंपरा, और रोगों से रक्षा की मान्यता के लिए जाना जाता है। यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और विशेष रूप से उत्तर भारत, ब्रज, राजस्थान, गुजरात, और मध्य प्रदेश में अत्यधिक श्रद्धा से मनाया जाता है।
शीतला अष्टमी का पौराणिक परिचय
माता शीतला को रोगों की देवी माना जाता है। उनकी पूजा का प्रमुख उद्देश्य है – चेचक, बुखार, संक्रमण, और त्वचा रोगों से रक्षा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता शीतला की कृपा से व्यक्ति और परिवार रोगमुक्त रहता है और जीवन में शांति, शीतलता, संतोष और सुख का वास होता है।
शीतला शब्द का अर्थ ही है – शीतल करने वाली, ठंडक और शांति देने वाली। यही कारण है कि इस दिन बासी और ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता है, ताकि शरीर को भी शीतलता मिले और स्वास्थ्य संतुलित रहे।
शीतला माता की प्रसिद्ध पौराणिक कथा
एक बार की बात है, एक गाँव में माता शीतला अपने वाहन गधे (खच्चर) पर सवार होकर भ्रमण कर रही थीं। उन्होंने देखा कि एक घर में चूल्हे पर गरम-गरम भोजन पक रहा है, जबकि पूरा गाँव रोग-संक्रमण से पीड़ित था। माता ने उस घर की स्त्री को समझाया कि गरम भोजन संक्रमण को बढ़ावा देता है, इसलिए शीतल भोजन अपनाओ। लेकिन स्त्री ने अहंकार में माता की बात अनसुनी कर दी।
परिणामस्वरूप, उसके घर में चेचक (smallpox infection, chechak rog) फैल गया और बच्चे बीमार पड़ गए। स्त्री ने माता से क्षमा मांगी और नीम के पत्ते, ठंडा जल, कलश, और बासी भोजन का भोग लगाकर माता की पूजा की। माता ने कृपा की, और परिवार रोगमुक्त हो गया।
तभी से यह परंपरा बनी कि शीतला अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले बना भोजन माता को अर्पित कर ग्रहण किया जाता है।
माता शीतला और उनकी पूजा सामग्री का महत्व
नीम के पत्ते
रोग-नाशक, शीतल, औषधीय गुण
कलश में ठंडा जल
शीतलता, संक्रमण से रक्षा
बासी/शीतल भोजन
स्वास्थ्य संतुलन, शरीर में ठंडक
झाड़ू (सूप/बुहारी)
नकारात्मकता और रोग-दोष की सफाई
कच्चा दूध
शीतलता और सात्विकता
चावल और हल्दी
शुभता, रक्षा और शांति
शीतल भोजन की परंपरा का वैज्ञानिक पक्ष
हालांकि यह पर्व धार्मिक आस्था पर आधारित है, लेकिन इसमें स्वास्थ्य से जुड़ा गहरा संदेश भी छिपा है। गर्मी की शुरुआत में संक्रमण, बैक्टीरिया, और वायरल रोग अधिक सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे समय में शीतल और बासी भोजन, विशेष रूप से दही, चावल, राबड़ी, गुड़, और नीम का सेवन, शरीर को ठंडक प्रदान करता है और त्वचा-जनित संक्रमण से बचाव में सहायक माना जाता है।
ग्रामीण समाज में जब smallpox infection (chechak rog) जैसी महामारी फैली थी, तब माता शीतला की पूजा के साथ-साथ नीम, ठंडे जल और शीतल भोजन का उपयोग वास्तव में एक public health protective tradition बन गया, जो disease prevention belief system के रूप में समाज में स्थापित हुआ।
व्रत और पूजा विधि (संक्षेप में)
सूर्योदय से पहले स्नान करें।
घर और पूजा स्थल पर नीम के पत्ते रखें।
माता की मूर्ति/चित्र के सामने ठंडा जल और बासी भोजन का भोग लगाएं।
हल्दी-चावल, कच्चा दूध, और गुड़ अर्पित करें।
माता से रोग-दोष, संक्रमण और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा की प्रार्थना करें।
पूजा के बाद प्रसाद के रूप में शीतल भोजन ग्रहण करें।
इस दिन चूल्हा न जलाएं, यह व्रत का प्रमुख नियम है।
शीतला अष्टमी का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व
रोगों से रक्षा का पर्व
प्रकृति और आयुर्वेद का सम्मान
नीम जैसी औषधीय वनस्पति के महत्व को स्थापित करना
मातृशक्ति की आराधना
स्वच्छता, शीतलता, और स्वास्थ्य संतुलन का संदेश
परिवार और समाज की सामूहिक सुरक्षा की प्रार्थना
शीतला अष्टमी हमें यह भी सिखाती है कि आस्था में भी स्वास्थ्य का हित निहित हो सकता है और हमारी परंपराएं जीवन को संतुलित और सुरक्षित रखने का माध्यम भी बन सकती हैं।
यात्रा जानकारी (प्रमुख शीतला माता मंदिर)
शीतला माता मंदिर, गुरुग्राम
शीतला माता मंदिर, चाकसू (जयपुर)
शीतला माता मंदिर, करौली (राजस्थान)
ब्रज क्षेत्र के ग्राम देवी मंदिर (स्थानीय परंपरा विशेष)
भक्तजन प्रायः नीम की टहनी, ठंडा जल, और शीतल प्रसाद लेकर माता के दर्शन हेतु जाते हैं। कई स्थानों पर sheetal jal se abhishek की विशेष परंपरा निभाई जाती है।
निष्कर्ष
शीतला अष्टमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि रोग-निवारण, प्रकृति-सम्मान, स्वच्छता, और मातृशक्ति की कृपा प्राप्त करने का महोत्सव है। इस दिन की शीतल भोजन परंपरा, नीम उपयोग, और ठंडे जल का भोग, यह संदेश देते हैं कि जीवन में शांति और स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।
जो भक्त माता शीतला की पूजा श्रद्धा और नियम से करता है, उसका जीवन शीतल, संतुलित, और रोग-दोष से सुरक्षित रहता है।

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