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सकट चौथ व्रत कथा 2026: महत्व, पूजा विधि, कब और कैसे करें | Sakat Chauth Vrat Katha in Hindi

🕉️ सकट चौथ व्रत कथा, महत्व और पूजा विधि (पूरा विवरण)


सकट चौथ व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व – भगवान गणेश की सकट चौथ पूजा
सकट चौथ व्रत पर भगवान गणेश की पूजा और कथा का पावन दृश्य


सकट चौथ का व्रत भगवान गणेश को समर्पित एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से संतान की रक्षा, सुख-समृद्धि और विघ्नों के नाश के लिए किया जाता है। सकट चौथ को संकष्टी चौथ भी कहा जाता है। इस दिन माताएं अपने पुत्रों की लंबी आयु के लिए निर्जल या फलाहार व्रत रखती हैं।

सकट चौथ के दिन शाम के समय चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भगवान गणेश की पूजा की जाती है और व्रत कथा का श्रवण किया जाता है।


📅 सकट चौथ व्रत कब किया जाता है?

सकट चौथ का व्रत माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है।
इस दिन चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है, इसलिए इसे चंद्र आधारित व्रत भी कहा जाता है।


🙏 सकट चौथ व्रत का महत्व

  • संतान की लंबी उम्र के लिए विशेष फलदायी

  • गणेश जी की कृपा से सभी संकट दूर होते हैं

  • घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है

  • विशेष रूप से माताओं के लिए अत्यंत शुभ व्रत

शास्त्रों के अनुसार, जो भक्त सकट चौथ व्रत कथा श्रद्धा से सुनता या पढ़ता है, उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं।


🪔 सकट चौथ पूजा विधि (Sakat Chauth Puja Vidhi)

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें

  2. दिनभर व्रत रखें (निर्जल या फलाहार)

  3. शाम को चंद्रमा निकलने के बाद पूजा करें

  4. चौकी पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें

  5. दूर्वा, मोदक, तिल के लड्डू, फल अर्पित करें

  6. सकट चौथ व्रत कथा का पाठ करें

  7. चंद्रमा को जल, दूध और तिल से अर्घ्य दें

  8. गणेश जी की आरती करें और व्रत खोलें


📖 सकट चौथ व्रत कथा (तीनों प्रचलित कथाएं)

पहली कथा भगवान शिव और श्री गणेश से जुड़ी है,
दूसरी कथा कुम्हार और सकट माता की महिमा बताती है,
और तीसरी कथा एक गरीब बुढ़िया मां और गणेश जी की कृपा की है।

यहां सकट चौथ की तीनों लोकप्रिय कथाएं एक साथ प्रस्तुत की जा रही हैं। श्रद्धालु अपनी इच्छा अनुसार किसी भी कथा का पाठ या श्रवण कर सकते हैं।


कथा 1: भगवान शिव और श्री गणेश की सकट चौथ कथा

एक दिन माता पार्वती स्नान के लिए गईं। स्नान से पूर्व उन्होंने अपने पुत्र श्री गणेश को द्वार पर पहरा देने के लिए खड़ा कर दिया और कहा कि जब तक वे स्वयं बाहर न आएं, किसी को भी अंदर प्रवेश न करने दें—चाहे वह कोई भी क्यों न हो।

मां की आज्ञा का पालन करते हुए गणेश जी पूरी निष्ठा से द्वार पर खड़े रहे। कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे और भीतर जाने लगे। गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। शिव जी यह समझ नहीं पाए कि उन्हें प्रवेश से क्यों रोका जा रहा है। उन्हें यह अपमानजनक लगा और वे क्रोधित हो उठे। क्रोध में आकर उन्होंने अपने त्रिशूल से प्रहार कर दिया, जिससे गणेश जी का सिर धड़ से अलग हो गया।

उसी समय भीतर से शोर सुनकर माता पार्वती बाहर आईं। अपने पुत्र की यह दशा देखकर वे अत्यंत व्यथित और क्रोधित हो गईं। उन्होंने शिव जी से अपने पुत्र को पुनः जीवित करने की मांग की।

तब भगवान शिव को अपनी भूल का आभास हुआ। उन्होंने अपनी शक्ति से एक हाथी का सिर लाकर गणेश जी के धड़ से जोड़ दिया और उन्हें नया जीवन प्रदान किया। तभी से श्री गणेश हाथी-मुख वाले देवता के रूप में पूजे जाने लगे।


कथा 2: कुम्हार, सकट माता और बुढ़िया के पुत्र की कथा

एक नगर में एक कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बर्तन बनाकर आंवां (भट्ठी) में पकाता था, लेकिन बार-बार प्रयास करने पर भी उसके बर्तन पक नहीं पाते थे। परेशान होकर वह राजा के पास गया। राजा ने राजपंडितों से कारण पूछा।

राजपंडितों ने कहा कि आंवां तभी पकेगा जब उसमें एक बच्चे की बलि दी जाए। राजा ने यह आदेश दे दिया। नगर में बलि का क्रम शुरू हो गया। जिस घर की बारी आती, वहां से एक बालक आंवां में बैठा दिया जाता।

कुछ समय बाद एक वृद्धा के इकलौते पुत्र की बारी आई। वह बुढ़िया बहुत दुखी हुई, क्योंकि उसका बेटा ही उसके जीवन का सहारा था। सकट चौथ का दिन था। बुढ़िया ने अपने पुत्र को सकट माता की सुपारी और दूर्वा देकर कहा—
“भगवान का नाम लेकर आंवां में बैठ जाना, सकट माता तुम्हारी रक्षा करेंगी।”

उस दिन बुढ़िया सकट माता की भक्ति में लीन होकर पूजा करने लगी। चमत्कार यह हुआ कि जो आंवां कई दिनों में भी नहीं पकता था, वह एक ही रात में पक गया और बालक सुरक्षित बाहर आ गया। सकट माता की कृपा से पहले जिन बच्चों की बलि दी गई थी, वे भी जीवित हो उठे।

यह देखकर पूरे नगर ने सकट माता की महिमा स्वीकार की और तभी से सकट चौथ का व्रत और पूजन आरंभ हुआ।


कथा 3: बुढ़िया मां और भगवान गणेश की कृपा

एक गांव में एक बहुत ही गरीब और नेत्रहीन बुढ़िया रहती थी। उसके साथ उसका बेटा और बहू रहते थे। वह प्रतिदिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा करती थी।

एक दिन भगवान गणेश प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हुए और बोले—
“बुढ़िया मां! जो चाहो मांग लो।”

बुढ़िया बोली—
“मुझे मांगना नहीं आता प्रभु, मैं क्या मांगूं?”

गणेश जी ने कहा—
“अपने बेटे-बहू से पूछ लो।”

बुढ़िया ने बेटे से पूछा तो उसने धन मांगने को कहा। बहू ने नाती की कामना रखी। बुढ़िया को लगा कि दोनों अपने-अपने स्वार्थ की बात कर रहे हैं। उसने पड़ोसियों से सलाह ली। उन्होंने कहा—
“मां! तू तो थोड़े दिन की मेहमान है, धन और संतान से अच्छा है कि तू अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, ताकि जीवन सुख से कटे।”

तब बुढ़िया ने गणेश जी से प्रार्थना की—
“हे प्रभु! यदि आप कृपा करें तो मुझे धन भी दें, स्वस्थ शरीर दें, अखंड सौभाग्य दें, नेत्र ज्योति दें, संतान-सुख दें, पूरे परिवार को सुख-शांति दें और अंत में मोक्ष प्रदान करें।”

यह सुनकर गणेश जी मुस्कराए और बोले—
“बुढ़िया मां! तुमने तो हमसे बहुत कुछ मांग लिया, फिर भी वचन के अनुसार तुम्हें सब मिलेगा।”

और ऐसा ही हुआ। बुढ़िया को उसका मांगा हुआ हर सुख प्राप्त हुआ।
हे गणेश महाराज! जैसे आपने उस बुढ़िया मां पर कृपा की, वैसे ही सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें।

🌙 सकट चौथ व्रत कैसे करें (How to Do Sakat Chauth Vrat)

  • व्रत श्रद्धा और नियम से करें

  • कथा अवश्य पढ़ें या सुनें

  • चंद्र दर्शन के बिना व्रत न खोलें

  • गणेश जी को दूर्वा जरूर चढ़ाएं


✨ निष्कर्ष

सकट चौथ व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व जानकर यदि यह व्रत श्रद्धा से किया जाए, तो जीवन के सभी संकट दूर होते हैं। भगवान गणेश अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं।

🙏 जय गणेशाय नमः 🙏






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