नारद मोह लीला क्या है? पूरी कथा, महत्व और सीख | Narad Moh Leela Full Story

 नारद मोह लीला का संपूर्ण वर्णन

नारद मुनि भगवान विष्णु के सामने खड़े हैं और विष्णु जी मुस्कुरा रहे हैं


🌼 प्रस्तावना

सनातन धर्म में भगवान अपने भक्तों को सही मार्ग दिखाने के लिए समय-समय पर अनेक लीलाएँ करते हैं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध और शिक्षाप्रद कथा है नारद मुनि और भगवान विष्णु से जुड़ी नारद मोह लीला।


यह कथा हमें बताती है कि आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी अहंकार मनुष्य को भ्रमित कर सकता है। भगवान विष्णु अपने भक्तों के कल्याण हेतु कभी-कभी उन्हें परीक्षा में डालते हैं ताकि उनका अहंकार समाप्त हो सके।



नारद मुनि का तप और अहंकार

पौराणिक कथाओं के अनुसार, नारद मुनि भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे निरंतर "नारायण नारायण" का जाप करते रहते थे और तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए भगवान की महिमा का प्रचार करते थे।

एक समय नारद मुनि ने कठोर तपस्या करके कामदेव को भी पराजित कर दिया। इस विजय के बाद उनके मन में यह अहंकार उत्पन्न हो गया कि अब वे किसी भी प्रकार के मोह या आकर्षण में नहीं फँस सकते।

उन्होंने अपनी इस विजय का वर्णन भगवान शिव के सामने किया। भगवान शिव ने उन्हें सावधान करते हुए कहा कि इस बात का उल्लेख भगवान विष्णु के सामने न करें, लेकिन नारद मुनि अपने गर्व के कारण उनकी बात नहीं मान सके।



भगवान विष्णु की अद्भुत लीला

नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुँचे और अपने तप व विजय का वर्णन किया। भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए उनकी बात सुनी और मन ही मन उनका अहंकार समाप्त करने का संकल्प लिया।

कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अपनी माया से एक अत्यंत सुंदर नगर और एक राजकुमारी का निर्माण किया। उस राजकुमारी के स्वयंवर का आयोजन किया गया।

जब नारद मुनि ने उस राजकुमारी को देखा तो वे उसके सौंदर्य पर मोहित हो गए। उन्होंने सोचा कि यदि वे उससे विवाह कर लें तो उनका जीवन सफल हो जाएगा।



विष्णु से वरदान की मांग

नारद मुनि भगवान विष्णु के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि उन्हें ऐसा रूप प्रदान करें जिससे राजकुमारी उन्हें ही पति के रूप में चुन ले।

भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, लेकिन अपनी लीला के अनुसार उन्होंने नारद मुनि को वानर समान चेहरा दे दिया। नारद मुनि को इस परिवर्तन का ज्ञान नहीं हुआ।



स्वयंवर में अपमान

स्वयंवर सभा में अनेक राजकुमार उपस्थित थे। नारद मुनि पूरे आत्मविश्वास के साथ वहाँ पहुँचे। उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही चुनेगी।

लेकिन जब राजकुमारी ने नारद मुनि को देखा तो वह उन्हें देखकर हँस पड़ी और भगवान विष्णु के रूप में आए राजकुमार को वरमाला पहना दी।

सभा में उपस्थित सभी लोग नारद मुनि का उपहास करने लगे। जब उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब देखा तो उन्हें अपने वानर रूप का ज्ञान हुआ।



नारद मुनि का क्रोध

अपमानित होकर नारद मुनि क्रोधित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि उन्हें भी स्त्री वियोग का कष्ट सहना पड़ेगा।

कहा जाता है कि यही श्राप आगे चलकर भगवान विष्णु के राम अवतार में फलित हुआ जब उन्हें माता सीता से वियोग सहना पड़ा।



अहंकार का नाश और आत्मबोध

कुछ समय बाद नारद मुनि को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें समझ आया कि भगवान विष्णु ने यह लीला उनके कल्याण के लिए की थी।

उन्होंने भगवान विष्णु से क्षमा माँगी और पुनः भक्ति मार्ग पर चलने लगे।


नारद मोह लीला से मिलने वाली शिक्षाएँ

✔ अहंकार सबसे बड़ा शत्रु होता है

✔ भगवान अपने भक्तों का कल्याण करते हैं

✔ भक्ति में विनम्रता आवश्यक है

✔ मोह और माया से बचना चाहिए

✔ सच्चा भक्त कभी गर्व नहीं करता



धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

नारद मोह लीला भक्तों को यह सिखाती है कि आध्यात्मिक उन्नति के बाद भी मनुष्य को विनम्र रहना चाहिए। यह कथा दर्शाती है कि भगवान की लीला को समझना अत्यंत कठिन है।

सनातन धर्म में इस कथा को अहंकार त्यागने और भक्ति मार्ग अपनाने की प्रेरणा के रूप में देखा जाता है।



कथा का वर्तमान समय में महत्व

आज के समय में भी यह कथा अत्यंत प्रासंगिक है। जब व्यक्ति सफलता प्राप्त करता है तो उसमें अहंकार आ जाता है। नारद मोह लीला हमें सिखाती है कि सफलता के साथ विनम्रता बनाए रखना आवश्यक है।





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